आत्मबल और दृढ़ता से ही कल्याण का पथ प्रशस्त होता है : मुनि श्री योगसागर जी महाराज

धर्म

आत्मबल और दृढ़ता से ही कल्याण का पथ प्रशस्त होता है : मुनि श्री योगसागर जी महाराज
कोटा, 06 अक्टूबर 2026। मंगलवार, आश्विन कृष्ण एकादशी के पावन अवसर पर श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि वस्तु के वास्तविक स्वरूप को समझ लेने के बाद मनुष्य को पांच पापों से बचने और सदाचार का निरंतर प्रयत्न करना चाहिए। आत्मबल को मजबूत करना तथा व्रत, नियम और संयम में अधिकाधिक रहने का प्रयास ही आत्मकल्याण के मार्ग को प्रशस्त करता है।

 

 

व्रत और संकल्प की दृढ़ता ही साधक की वास्तविक शक्ति
मुनि श्री ने कहा कि जब व्यक्ति के भीतर दृढ़ता मजबूत होती है और वह अपने व्रत एवं नियमों का दृढ़तापूर्वक पालन करता है, तब उसका संयम और पुण्य बलवती होता है। चारित्र एवं व्रत की दृढ़ता की परीक्षा जीवन में अवश्य होती है। परिस्थितियां चाहे जैसी हों, साधक को अपने संकल्प से विचलित नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अच्छे कार्य करते रहने से उनका अतिशय निश्चित रूप से प्रकट होता है। साधक की परीक्षा विपरीत परिस्थितियों में ही होती है। अनुकूल समय में संकल्प पर टिके रहना सहज है, लेकिन प्रतिकूल परिस्थितियों में भी धर्म, व्रत और संयम को नहीं छोड़ना ही वास्तविक आत्मबल है।
दृष्टि संसार पर नहीं, आत्मा और परमात्मा पर हो
मुनि श्री ने कहा कि हमारी दृष्टि आत्मा, धर्म और परमात्मा की ओर होनी चाहिए, संसार के किसी व्यक्ति के प्रति नहीं। विपरीत परिस्थितियों से घबराना उसी की कमजोरी है, जिसकी आंतरिक शक्ति और श्रद्धा अभी दृढ़ नहीं हुई है।
महापुरुषों की दीक्षा और साधना के पीछे उनका विवेक, दृढ़ संकल्प और आत्मबल अत्यंत मजबूत रहा है। यदि व्यक्ति अपने सम्यक दर्शन और विवेक का प्रयोग करे तो छोटा से छोटा व्यक्ति भी युक्ति और पुरुषार्थ के माध्यम से कर्मों एवं परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करने का सामर्थ्य रखता है।
निष्पृहता से त्याग और त्याग से वैराग्य का उदय
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि निष्पृहता अर्थात इच्छाओं और कामनाओं का त्याग साधना का महत्वपूर्ण आधार है। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं का त्याग करता जाता है, उसके भीतर त्याग के साथ-साथ वैराग्य और आत्मिक शांति का भाव भी विकसित होता जाता है।
उन्होंने कहा कि तीर्थंकर भगवान की वाणी के प्रति अटल श्रद्धा रखते हुए सम्यक ज्ञान के साथ सम्यक चारित्र को भी अपनाना चाहिए। केवल ज्ञान प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है; उस ज्ञान को आचरण में उतारना आवश्यक है। ज्ञान और चारित्र का समन्वय ही मोक्षमार्ग को प्रशस्त करता है।
ज्ञान सुनना नहीं, जीवन में उतारना ही सच्ची शिक्षा
मुनि श्री ने विद्यार्थी और शिष्य के अर्थ को समझाते हुए कहा कि विद्यार्थी का उद्देश्य केवल विद्या प्राप्त करना नहीं, बल्कि विद्या को अपने जीवन में उतारकर स्वयं ज्ञानस्वरूप बनना है। इसी प्रकार शिष्य का लक्ष्य केवल गुरु से ज्ञान सुनना नहीं, बल्कि उस ज्ञान को अपने जीवन में धारण कर ज्ञानरूप बनने का पुरुषार्थ करना है।
उन्होंने कहा कि शिष्य को गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा एवं समर्पण रखते हुए उनके बताए मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। गुरु से प्राप्त ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह जीवन के आचरण और परिणामों में दिखाई दे।
श्रद्धा, ज्ञान, विवेक और संयम से आत्मकल्याण का मार्ग
मुनि श्री ने कहा कि आत्मकल्याण के लिए श्रद्धा, ज्ञान, विवेक, व्रत, संयम और दृढ़ता—इन सभी का जीवन में समन्वय आवश्यक है। जब साधक इन गुणों के साथ आगे बढ़ता है तो कर्मों की परिस्थितियां उसे रोक नहीं सकतीं और आत्मा की उन्नति का मार्ग निरंतर प्रशस्त होता जाता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को परिस्थितियों को दोष देने के बजाय अपने आत्मबल को मजबूत करने का पुरुषार्थ करना चाहिए। दृढ़ संकल्प, धर्म में अटूट श्रद्धा और संयमित जीवन ही साधक को आत्मकल्याण की दिशा में आगे ले जाता है।
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🌺 आज के प्रमुख पुण्यार्जक
विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से किया पुण्यार्जन
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, बसंत विहार कमेटी के अध्यक्ष शिखर श्रीमाल एवं मंत्री अन्तिम बगड़ा तथा श्रद्धालु परिवारों द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया।
कलश स्थापना का पुण्यार्जन भी श्रद्धालु परिवार द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमान राजेंद्र जी, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार, श्रीमान सागर मल, आशीष एवं आदित्य जैन, भोपाल, मध्यप्रदेश, तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रद्धालुओं द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ श्रीमान अजित जी, विकास जी, प्रीति लुहाड़िया एवं समस्त परिवार, दादाबाड़ी, कोटा को प्राप्त हुआ।
श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमती कलावती जी, अभय जी जैसवाल परिवार को प्राप्त हुआ।
इस अवसर पर मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी हर्षा कोटिया द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
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🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश
वस्तु के वास्तविक स्वरूप को समझकर पांच पापों से बचना और सदाचार को जीवन में उतारना आवश्यक
परिस्थितियां कैसी भी हों, व्रत और संकल्प से विचलित न होना ही साधक की दृढ़ता
निष्पृहता से त्याग, त्याग से वैराग्य और वैराग्य से आत्मिक शांति का मार्ग प्रशस्त
सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र का समन्वय ही मोक्षमार्ग की वास्तविक साधना
विद्यार्थी और शिष्य वही, जो ज्ञान को सुनने तक सीमित न रखकर जीवन में उतारे

आज के प्रवचन का सार
आत्मबल, दृढ़ता और धर्म में अटूट श्रद्धा ही साधक को कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ाती है। परिस्थितियां कैसी भी हों, व्रत, नियम और संयम से विचलित नहीं होना चाहिए। इच्छाओं और कामनाओं का त्याग निष्पृहता को जन्म देता है, निष्पृहता से वैराग्य और वैराग्य से आत्मिक शांति का मार्ग प्रशस्त होता है। सम्यक ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह सम्यक चारित्र के रूप में जीवन में दिखाई दे। गुरु से प्राप्त ज्ञान को आचरण में उतारकर, श्रद्धा-विवेक और पुरुषार्थ के साथ आगे बढ़ना ही आत्मकल्याण की सच्ची दिशा है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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