संतों के त्याग और साधना से फिर खड़ी हुई दिगंबर मुनि परंपरा : आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी

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संतों के त्याग और साधना से फिर खड़ी हुई दिगंबर मुनि परंपरा : आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी

सम्मेदशिखरजी में ब्रह्मचर्य व्रत से शुरू हुआ संयम का मार्ग, अनेक संतों ने आगे बढ़ाई साधना और धर्म प्रभावना

केशवरायपाटन। देश में आज दिखाई दे रही दिगंबर जैन मुनि परंपरा के पीछे संतों के त्याग, तपस्या और वर्षों की कठोर साधना की लंबी परंपरा रही है। एक समय ऐसा भी आया जब दिगंबर मुनिराजों की परंपरा लगभग दिखाई नहीं देती थी, लेकिन अनेक संतों ने अपने संयम, त्याग और साधना के बल पर इस परंपरा को पुनर्जीवित कर आगे बढ़ाया। यह विचार भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने सोमवार को धर्मसभा में व्यक्त किए।

 

 

अंग्रेजों के आगमन के दौर में संत परंपरा का पुनर्जागरण

आर्यिका माताजी ने कहा कि 16वीं सदी के आसपास अंग्रेज व्यापार के उद्देश्य से भारत आए और ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की। उन्होंने तत्कालीन राजाओं से व्यापार की अनुमति प्राप्त की और धीरे-धीरे अपनी स्थिति मजबूत करते गए। राजाओं के बीच आपसी संघर्ष और फूट बढ़ने का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने भारत में अपना प्रभाव और आधिपत्य स्थापित किया।

 

 

माताजी ने कहा कि इसी कालखंड में जैन समाज में साधु परंपरा को पुनर्जीवित करने वाले महान संतों का भी प्राकट्य हुआ। उन्होंने बताया कि वर्ष 1866 में आचार्य आदिसागर तथा 1872 में आचार्य शांतिसागर का जन्म हुआ। बाल्यकाल में उनके जीजा शास्त्र लेकर आए और उन्हें स्वाध्याय कराया। नेमिनाथ भगवान के वैराग्य एवं दीक्षा प्रसंग को सुनकर उनके भीतर भी वैराग्य की भावना जागृत हुई और उन्होंने विवाह न करने का संकल्प लिया।

 

सम्मेदशिखरजी में लिया ब्रह्मचर्य व्रत

माताजी ने बताया कि सम्मेदशिखरजी की वंदना के दौरान पारसनाथ भगवान की टोंक पर उन्होंने सप्तम प्रतिमा धारण करते हुए ब्रह्मचर्य व्रत स्वीकार किया और रंगीन वस्त्रों का त्याग कर दिया। इसके बाद विभिन्न तीर्थ क्षेत्रों की यात्रा करते हुए उन्होंने क्षुल्लक दीक्षा और मुनि दीक्षा ग्रहण की तथा आगे चलकर आचार्य पद प्राप्त किया।

उन्होंने छाणी परंपरा का विस्तार किया। इसके बाद अनेक संतों ने तप, त्याग, संयम और साधना के माध्यम से इस परंपरा को आगे बढ़ाया तथा जैन धर्म की प्रभावना की। माताजी ने कहा कि संतों की इसी साधना और त्याग की परंपरा का प्रभाव आज भी दिखाई देता है और वर्तमान में इस परंपरा के आचार्य ज्ञेयसागर जी महाराज हैं।

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

 

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