मोबाइल ने गांधीजी के तीन बंदरों को मिलाकर बना दिया नया खिलौना!
अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज का गांधी जयंती पर चिंतनपूर्ण संदेश—“दूसरों को वश में करना मंत्र-शक्ति, स्वयं की वाणी और मन को वश में करना महाशक्ति”
/सोनकच्छ।
गांधीजी के तीन बंदरों का संदेश तो पूरी दुनिया जानती है—बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत बोलो। लेकिन आज के आधुनिक विज्ञान ने इन तीनों को मिलाकर एक ऐसा नया खिलौना बना दिया है, जो हर हाथ में नजर आता है। वह है मोबाइल फोन! यह खिलौना कभी मनुष्य को हंसाता है, कभी रुलाता है, कभी भटकाता है, तो कभी घंटों तक अपने मोहपाश में बांधे रखता है।
यह गहन चिंतन व्रत चक्रवर्ती, पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज ने गांधी जयंती के अवसर पर अपने लिखित संदेश में व्यक्त किया। उन्होंने आधुनिक जीवन में मोबाइल के बढ़ते प्रभाव के साथ मनुष्य के चंचल मन, आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण की आवश्यकता पर महत्वपूर्ण संदेश दिया।
पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ में परम पूज्य तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के सान्निध्य में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज ससंघ का वर्षायोग चल रहा है। इसी दौरान आचार्य श्री 29 सितंबर से मौन साधना एवं एकांतवास में हैं। मौन साधना के क्रम में ही उन्होंने गांधी जयंती पर भक्तों के लिए यह विचारोत्तेजक लिखित संदेश दिया।
### मोबाइल के मोहपाश में उलझा मनुष्य, तीनों बंदरों का संदेश हुआ प्रासंगिक
आचार्य श्री ने मोबाइल की आदत पर चिंतन करते हुए कहा कि आज मनुष्य जब मोबाइल हाथ में लेता है, तो वह आसपास की दुनिया से मानो कट जाता है। न सामने बैठे व्यक्ति को ठीक से देखता है, न उसकी बात सुनता है और न ही उससे संवाद करता है। मोबाइल की आभासी दुनिया में डूबा मनुष्य कई बार अपने आसपास मौजूद रिश्तों, भावनाओं और वास्तविक जीवन से भी दूर होता चला जाता है।
गांधीजी के तीन बंदरों का संदेश था—बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत बोलो। आज मोबाइल ने इन तीनों प्रतीकों को एक साथ मनुष्य के हाथ में पहुंचा दिया है। आचार्य श्री का यह कथन तकनीक के दौर में मानवीय व्यवहार और मोबाइल की बढ़ती निर्भरता पर गहरा विचार करने का अवसर देता है।
### शराब, बिच्छू और दर्पण वाला बंदर भी मन की चंचलता के आगे फीका
मनुष्य के मन की चंचलता को समझाने के लिए आचार्य श्री ने बंदर का उदाहरण दिया। बंदर स्वभाव से ही चंचल होता है। कल्पना कीजिए, उस बंदर को शराब पिला दी जाए, फिर बिच्छू डंक मार दे, उसके गले में पुष्पहार डाल दिया जाए, हाथ में दर्पण पकड़ा दिया जाए और ऊपर से उसे किसी भूत-प्रेत का भय भी सता रहा हो, तो उसकी बेचैनी और चंचलता कितनी बढ़ जाएगी!
आचार्य श्री के संदेश का भाव है कि मनुष्य का मन भी कुछ ऐसा ही है। उसमें विचारों, इच्छाओं, आकर्षणों, भय, मोह और अहंकार की अनगिनत तरंगें उठती रहती हैं। मोबाइल की निरंतर बदलती सामग्री इन तरंगों को और बढ़ा सकती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति चाहकर भी अपने मन को एकाग्र नहीं रख पाता।
### तकनीक नहीं, उसका अनियंत्रित उपयोग है चिंता का विषय
मोबाइल आज सूचना, संवाद और ज्ञान का महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन जब मनुष्य उसका उपयोग विवेक के बजाय आदत और आकर्षण के वशीभूत होकर करने लगता है, तब सुविधा का यही साधन मानसिक भटकाव का कारण बन सकता है।
आचार्य श्री का संदेश यही प्रेरणा देता है कि तकनीक का उपयोग करते समय मनुष्य को अपनी प्राथमिकताओं, समय और व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए। मोबाइल हमारे हाथ में रहे, हमारा मन मोबाइल के हाथों में न चला जाए। यही आधुनिक जीवन में संयम की सार्थकता है।
### दूसरों पर विजय से बड़ी है स्वयं के मन पर विजय
आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने अपने संदेश में आत्मसंयम की महत्ता को इन शब्दों में व्यक्त किया—
“दूसरों को वश में करना मंत्र-शक्ति है, परंतु स्वयं की वाणी और मन को वश में करना महाशक्ति है।”
यह संदेश केवल मोबाइल के उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन जीने की कला से भी जुड़ा है। दूसरों को समझाना आसान हो सकता है, लेकिन अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना, क्रोध को शांत करना, इच्छाओं को मर्यादित करना और चंचल मन को सही दिशा देना वास्तविक साधना है।
गांधी जयंती पर अंतर्मना आचार्य श्री का यह संदेश आधुनिक समाज को आत्ममंथन की प्रेरणा देता है। महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा और आत्मानुशासन के माध्यम से जीवन को दिशा दी। वहीं आचार्य श्री का संदेश याद दिलाता है कि आज के तकनीकी युग में भी मनुष्य की वास्तविक शक्ति बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपे संयम, विवेक और आत्मनियंत्रण में है।
जानकारी : नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, प्रचार-प्रसार संयोजक, औरंगाबाद। से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312






