आरके मार्बल ग्रुप की श्रीमती सुशीला पाटनी ने गुरुदेव के चरणों में समर्पित की भावांजलि
आचार्य श्री सुनीलसागरजी का संदेश—“तत्वज्ञान को जीवन का मीत बनाने वाला जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होने की दिशा में बढ़ता है”
नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर
जीवन में धन, परिवार और सांसारिक वैभव के बीच मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है, जबकि आत्मकल्याण का मार्ग तत्वज्ञान से होकर गुजरता है। तत्वज्ञान को जीवन का सच्चा मित्र बनाने वाला व्यक्ति मोह और आसक्ति से ऊपर उठकर मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है। यह प्रेरणादायी संदेश आचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी गुरुदेव ने अपने प्रवचन में दिया।
गुरुदेव के पावन दर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आरके मार्बल ग्रुप की श्रीमती सुशीला पाटनी ने नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर में गुरुदेव के दर्शन किए। इस अवसर पर उन्होंने अपने हृदय की भावनाओं को शब्दों और भक्तिमय गीतों के माध्यम से गुरुदेव के श्रीचरणों में समर्पित किया। उनकी भावपूर्ण अभिव्यक्ति में गुरु के प्रति श्रद्धा, समर्पण और भक्ति का अनुपम संगम दिखाई दिया।
श्रीमती सुशीला पाटनी ने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि गुरुदेव का ज्ञान आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। उनके आशीर्वाद से जीवन में धर्म और संस्कारों की ज्योति प्रज्वलित होती है। गुरुवर के चरणों की धूल भी उनके लिए सौभाग्य है। उनका पावन सान्निध्य आत्मा का सौंदर्य और उनके उपदेश जीवन की अमूल्य निधि हैं।
इसके पश्चात उन्होंने भक्ति गीत की पंक्तियों के माध्यम से अपनी श्रद्धा अर्पित की—
“तुम गुरुवर संयम से रहते हो, कितने संकट सहते हो, सहते हो… चरणों में हम झुक जावें, भक्ति में हम खो जावें…”
भक्ति से ओतप्रोत इन पंक्तियों ने गुरुदेव के प्रति उनकी गहन आस्था और समर्पण की भावना को अभिव्यक्त किया।

संसार के मेले में खोकर मत भूलो अपना वास्तविक स्वरूप : आचार्य श्री
प्रवचन के दौरान आचार्य श्री सुनीलसागरजी ने जीवन के वास्तविक स्वरूप, कर्मसिद्धांत और तत्वज्ञान की महत्ता को सरल एवं प्रेरक शब्दों में समझाया। उन्होंने कहा कि जीव संसार में अकेला जन्म लेता है और अकेला ही मृत्यु को प्राप्त होता है। अपने कर्मों के अनुसार उसे सुख-दुःख का अनुभव करना पड़ता है।
आचार्यश्री ने इस भाव को इन शब्दों में व्यक्त किया— “जन्मे-मरे अकेला चेतन, सुख-दुःख का भोगी।”
उन्होंने समझाया कि जीव के जन्म और मरण के बीच संसार का एक विशाल मेला सजता है। इस मेले में परिवार, रिश्ते-नाते, धन-संपत्ति और अनेक प्रकार के सांसारिक आकर्षण होते हैं। मनुष्य इन्हीं में उलझकर अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को भूल जाता है। मोह और आसक्ति के कारण वह संसार के बंधनों में जकड़ा रहता है और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता।
आचार्यश्री ने कहा कि संसार के इस मेले में उलझा जीव अपने कर्मों के प्रभाव से 84 लाख योनियों में भटकता रहता है। यदि मनुष्य अपने जीवन के उद्देश्य को समझ ले और तत्वज्ञान को अपना सच्चा मित्र बना ले, तो वह मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मकल्याण की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि सांसारिक जीवन जीते हुए भी अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानें। धन, परिवार और संबंधों के बीच रहते हुए आत्मचिंतन तथा तत्वज्ञान को जीवन में स्थान दें। यही ज्ञान जीव को मोह और आसक्ति से मुक्त करने तथा आत्मिक शांति एवं मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करने में सहायक बनता है।
संदेश स्पष्ट है—संसार के मेले में रहना है, लेकिन उसमें खोना नहीं है। अपने आत्मस्वरूप को पहचानकर तत्वज्ञान को जीवन का मीत बनाना ही आत्मकल्याण की दिशा में सार्थक कदम है।
जानकारी प्राप्ति एवं संकलन: माही जैन धीरावत, पीपलखूंट, प्रतापगढ़।
समाचार संकलन:
अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी।






