जो स्वाश्रित जीने की कला सिखाये, उसका नाम है उत्तम तप धर्म : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज

धर्म

जो स्वाश्रित जीने की कला सिखाये, उसका नाम है उत्तम तप धर्म : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज
सागर
14 सितम्बर 2024, शनिवार• भाग्योदय तीर्थक्षेत्र, सागर
भाग्योदय तीर्थ परिसर में मंगल प्रवचन देते हुए पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 सुधा सागर महाराज ने उत्तम तप धर्म पर बोलते हुए कहा कि
धर्म वह नही है जो पर वस्तु को ग्रहण करने की बात करें, जब व्यक्ति के मन में एक अनुभूति जागती है कि मैं अपने आप में पूर्ण हूँ जो हमारा है वही हमारा है। एक धर्म वह है जो पर पदार्थ यदि वो हमें अपना मानेगा तो भी मैं उसे अपना नहीं मानता, दुनिया मुझे अपना मानती रहे तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता, ज्ञानी व्यक्ति किसी को अपना नहीं मानता। सम्यकदर्शन यही सिखाता है कि दुनिया में रहो लेकिन दुनिया के होके मत रहो। दुनिया को लगे कि तुम मेरे हो लेकिन तुम किसी के मत होना।

 

उन्होंने कहा जो व्यक्ति संसार में नाटक करना सीख गया उसको सम्यकदर्शन हो जाता है। सारे रिश्तों को वह निभाता है लेकिन वह स्वयं रिश्तेदार नहीं बनता। अपने अनुभव को वह जानता है कि मैं कौन हूँ, ये तो सब नाटक है, मनोरंजन है,

आत्मरंजन नही। धर्मात्मा पर, सीधे लोगों पर उपसर्ग क्यों आते है क्योंकि दुनिया में उनका धर्म प्रकट हो गया, उनको पता चल गया कि ये धर्मात्मा बन गया, ये कुछ नही करेगा, मारों पीटो कितना भी कुछ कर लो।इसलिए या तो तू साधु बनकर साधना

 

 

कर, जितने उपसर्ग आते है उन्हें झेल। साधु को दुनिया सुखी नहीं रहने देगी क्योंकि तू साधू है सज्जन है। अब यदि तुझे धर्मात्मा बनना है तो क्रोध का नाटक करना सीख, महाराज ने सिखाया- क्रोध करना नहीं, क्रोध का नाटक करना। मान करना नही, मान का नाटक करना, मायाचारी करना नहीं, मायाचारी का नाटक करना, जैसे माँ करती है। नाटक करने का नाम ही तप है।

 

संयम में हेय को, अभक्ष्य को, अहितकारी को छोड़ा जाता है, जो हितकारी, सहयोगी है उनको ग्रहण करो। संयम सिखाता है कि जो तुम्हारा अहित नहीं करते है, ऐसे पर पदार्थ को ग्रहण करो। भूख लगी है रोटी खाओ, अभक्ष्य मत खाना, प्यास लगी है पानी पियो, शराब मत पीना, पैसा चाहिए है नीति से कमाओ, अनीति से मत कमाना। तप कहता है उपकारी को भी छोड़ो। रोटी उपकारी है, प्रतिदिन नही छोड़ सकते तो दशलक्षण के दस दिन छोड़ो। चाहे भक्ष्य हो या अभक्ष्य, उपकारी हो या अपकारी पर तो पर ही है। अपन जैसे-जैसे धर्म करते जाएंगे अनंत गुणा विशुद्ध होते जाएंगे।

 

स्वाश्रित होकर मर जाना भी ठीक है लेकिन पर के आश्रित होकर जिंदा रहना भी ठीक नहीं। भीख मांग लेना ठीक है लेकिन दूसरे की गुलामियत ठीक नही, यह सब विचारणीय है। तप यही सिखाता है किसकी बदौलत जिंदा है- रोटी से, दिखा दुनिया को मैं बिना रोटी के भी जिंदा रह के दिखाता हूँ। जिसे सारी दुनिया अच्छा मानती है, उसको भी छोड़ने का साहस करता है वही मुनि कहलाता है, जिसका नाम तपस्वी है।
अजय जैन लांबरदार सागर से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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