मेहनत से दरिद्रता, धर्म से पाप और मौन से कलह होती है दूर : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी
29 सितंबर से 20 अक्टूबर तक मौन साधना में रहकर दिया जीवन को सफल बनाने का संदेश
/सोनकच्छ।
“मेहनत करने से दरिद्रता नहीं रहती, धर्म करने से पाप नहीं टिकता और मौन रहने से कलह-अशांति नहीं बढ़ती।” व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज ने मौन साधना के दौरान अपने मौन संदेश में जीवन को सार्थक बनाने के लिए पुरुषार्थ, धर्म और मौन के महत्व को बताया है।
सोनकच्छ स्थित पुष्पगिरी तीर्थ में परम पूज्य पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के सान्निध्य में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज ससंघ वर्षायोग के लिए विराजमान हैं। उनके सान्निध्य में विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी श्रृंखला में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने 29 सितंबर से 20 अक्टूबर तक मौन साधना प्रारंभ की है।
पुरुषार्थ से मिलती है सफलता
आचार्य श्री ने अपने संदेश में कहा कि मनुष्य जीवन को सही मायने में सफल और सार्थक करने का मार्ग मेहनत और पुरुषार्थ है। संसार के सुख और सफलता प्राप्त करने के लिए निरंतर मेहनत आवश्यक है। वहीं भीतर के सुख और आनंद को बढ़ाने के लिए सम्यक पुरुषार्थ के माध्यम से आत्मिक शक्ति को पहचानना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अपार शक्ति और क्षमताएं मौजूद हैं। आवश्यकता केवल उन्हें सही दिशा देने की है। जब व्यक्ति अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानकर सकारात्मक दिशा में पुरुषार्थ करता है, तो वह जीवन में बार-बार ठोकर खाने से बच सकता है।
धर्म है भीतर की सुप्रीम पावर
आचार्य श्री ने धर्म को मनुष्य के भीतर की ‘सुप्रीम पावर’ बताते हुए कहा कि धर्म पाप को टिकने नहीं देता। यदि व्यक्ति अपनी संवेदना और चेतना को आस्था, विश्वास, श्रद्धा और निष्ठा के साथ धर्म से जोड़ ले, तो जीवन में वास्तविक सुख और शांति का अनुभव किया जा सकता है।
उन्होंने संदेश दिया कि धन मृत्यु तक का साथी है, जबकि धर्म निर्वाण तक का साथी है। इसलिए मनुष्य को केवल बाहरी सुख-सुविधाओं के पीछे नहीं भागना चाहिए, बल्कि अपने भीतर की चेतना और आध्यात्मिक शक्ति को भी जागृत करना चाहिए।
मौन से जागृत होती है चेतना
मौन साधना के महत्व पर आचार्य श्री ने कहा कि मौन हमारी उपलब्धियों में सहयोगी है। मौन का लाभ और आनंद सांसारिक सुखों से कहीं अधिक है। चेतना की अनंत शक्तियों का भंडार मौन में छिपा हुआ है। मौन की शक्ति से ही व्यक्ति अपनी भीतर की चेतना को जागृत कर सकता है।
उन्होंने कहा कि मौन व्यक्ति को भौतिक जीवन की भागदौड़ से निकालकर आध्यात्मिक जीवन से जोड़ता है। मौन केवल बोलना बंद करना नहीं, बल्कि अपने भीतर उतरने और जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने की साधना है।
आचार्य श्री के मौन संदेश में जीवन के मर्म को समझने का आह्वान करते हुए कहा गया कि व्यक्ति को अपने भीतर के रहस्य को जानना चाहिए और यह समझना चाहिए कि जीवन अखंड है। इस सत्य को समझकर जीवन को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाना चाहिए।
प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद ने यह जानकारी दी।
