‘तीन छलनियों से गुजरें हमारे शब्द, वचनों से होती है व्यक्तित्व की पहचान’— आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.
हैदराबाद
त्रयनगर स्थित श्री जिनकुशल दादाबाड़ी बाग के प्रांगण में आयोजित श्रीसंघ शास्त्र वार्षिक वर्षावास 2026 के अंतर्गत 29 सितंबर 2026 को चातुर्मासार्थ विराजमान परम पूज्य गुरुदेव खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. आदि ठाण तथा पूज्या गणिनी प्रवरा श्री सुलोचनाश्रीजी म.सा. आदि ठाणा-34 के सानिध्य में धर्मसभा आयोजित हुई।
पूज्यश्री ने इंद्रियों के सदुपयोग और दुरुपयोग पर चिंतन कराते हुए कहा कि जीवन में दुरुपयोग अधिक दिखाई देता है। इसे केवल अनादि संस्कारों और आदतों का परिणाम मान लेना अपने पुरुषार्थ की उपेक्षा है। हमारी रुचि, संकल्प और निर्णय ही जीवन की दिशा बदल सकते हैं। रुचि ही धर्म है, रुचि ही श्रद्धा है और रुचि ही मोक्ष का निमित्त है।
उन्होंने कहा कि हमारे भीतर दोष भी हैं और गुण भी। निमित्त मिलने पर क्रोध प्रकट होता है या समता, यही बताता है कि भीतर क्या संचित है। धर्म का पुरुषार्थ दोषों को दूर करना है, जबकि मन अक्सर उन्हीं दोषों को पकड़े रखना चाहता है।
तीन छलनियों से परखें अपने शब्द
इसी क्रम में पूज्यश्री ने तीन छलनियों का सूत्र दिया—पहली सच्चाई, दूसरी अच्छाई और तीसरी उपयोगिता।
उन्होंने कहा कि हम जो देखें, सुनें या कहें, वह सत्य हो। सत्य होने के साथ ऐसा भी हो जिससे द्वेष या विवाद न बढ़े और अंततः वह हमारे जीवन, भविष्य तथा आत्मकल्याण के लिए उपयोगी हो।
उन्होंने कहा कि अपनी कृति, उक्ति, श्रुति और स्मृति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। हर शब्द, हर दृश्य और हर प्रतिक्रिया को इन
तीन छलनियों से छानने की आदत जीवन को नई दिशा दे सकती है।
जीवन बदलने के लिए बहुत कुछ बदलना आवश्यक नहीं है, केवल अपनी रुचि की दिशा बदलनी है।
वचनों पर विजय सबसे जरूरी
इस अवसर पर मुनि विरक्तप्रभसागरजी म.सा. ने वाणी के संयम और इंद्रियों के सदुपयोग पर चिंतन कराया। उन्होंने कहा कि आसक्ति पर विजय जितनी आवश्यक है, उससे भी अधिक आवश्यक है वचनों पर विजय।
उन्होंने एक प्रसंग के माध्यम से समझाया कि राजा, मंत्री और सैनिक जंगल में मार्ग भूल गए। उन्होंने एक सूरदास से रास्ता पूछा। सैनिक ने कठोरता से, मंत्री ने कुछ मधुरता से और राजा ने विनम्रता से प्रश्न किया। सूरदास ने राजा को तुरंत मार्ग बता दिया।
राजा के पूछने पर उन्होंने कहा कि आंखों से पहचानने में भूल हो
सकती है, लेकिन वचनों से व्यक्तित्व की पहचान हो जाती है।
मुनिश्री ने कहा कि हमारे वचन ही हमारी पहचान हैं। इसलिए कम बोलें, सोच-समझकर बोलें और ऐसा कुछ न कहें जिससे किसी के मन में आक्रोश उत्पन्न हो अथवा संघ, समाज, परमात्मा, गुरु या धर्म की हानि हो।
धर्मश्रवण का सार तभी है, जब हमारी वाणी मधुर, संयमित और कल्याणकारी बने।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312




