रुको, झुको, घुलो, मिलो—क्षमावाणी का यही संदेश
सम्मेद शिखरजी में एक मंच पर जुटे विभिन्न परंपराओं के साधु-साध्वी, मुनि प्रमाण सागर बोले—क्षमा को संदेश नहीं, जीवन का व्यवहार बनाएं
मधुबन/सम्मेद शिखरजी।
तीर्थराज श्री सम्मेद शिखरजी की पावन धरा पर रविवार को क्षमावाणी पर्व का ऐसा अनूठा और भावपूर्ण आयोजन हुआ, जिसने साधु-संतों के बीच आत्मीयता, समन्वय और परस्पर सम्मान की नई मिसाल प्रस्तुत की। गुणायतन परिसर में विभिन्न परंपराओं के साधु-साध्वी एक मंच पर एकत्रित हुए और सामूहिक रूप से क्षमावाणी पर्व मनाया।
गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज की प्रेरणा से आयोजित इस विशेष समारोह में सभी साधु-साध्वियों ने मन, वचन और काय से जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए एक-दूसरे से क्षमा याचना की। गुणायतन परिवार की ओर से सभी साधु एवं साध्वियों को शास्त्र एवं श्रीफल अर्पित कर सम्मान किया गया।

क्षमावाणी के चार सूत्र—रुको, झुको, घुलो, मिलो
समारोह में मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने क्षमावाणी के पूरे दर्शन को चार शब्दों में समेटते हुए कहा—“रुको, झुको, घुलो, मिलो।”
उन्होंने कहा कि जीवन में जब कभी आवेग, आवेश या क्रोध आए तो तत्काल प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए। कम से कम दस सेकंड रुककर तीन गहरी श्वास लें और विचार करें कि सामने वाले की बात प्रतिक्रिया देने योग्य है या विचार करने योग्य।
उन्होंने कहा कि यदि सामने वाले की बात सही है तो उसे स्वीकार करते हुए दोनों हाथ जोड़कर क्षमा मांग लें, अर्थात झुक जाएं। यदि बात सही नहीं है तो उसे सुनकर छोड़ दें, लेकिन मन में उसकी गांठ न बांधें।
मुनि श्री ने कहा कि जिस प्रकार धागे में गांठें बढ़ती जाती हैं तो उसकी लंबाई कम होती जाती है, उसी प्रकार मन में पुरानी बातों को जमा करते रहने से जीवन संकुचित होता जाता है। रुकने से नई गांठ पड़ने से बचती है और झुकने से पुरानी गांठ खुलती है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को क्षमावाणी के बाद स्वयं से पूछना चाहिए कि उसने बीते वर्ष में कितनी पुरानी गांठें खोलीं और कितनी नई गांठें बांध लीं। केवल क्षमावाणी पर्व मनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि क्षमा का भाव जीवन के व्यवहार में उतरना चाहिए।
“चीजों को फॉरवर्ड मत करो, जीवन को फॉरवर्ड बनाओ”
मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने क्षमावाणी के वर्तमान स्वरूप की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि आज कई बार क्षमावाणी केवल व्हाट्सऐप संदेशों तक सीमित होकर रह गई है। लोग संदेश पढ़े बिना ही उसे आगे भेज देते हैं।
उन्होंने संदेश देते हुए कहा—“चीजों को फॉरवर्ड मत करो, जीवन को फॉरवर्ड बनाओ।”
उन्होंने कहा कि जीवन को आगे बढ़ाने के लिए मन की पुरानी गांठें खोलनी होंगी और क्षमा को केवल संदेश नहीं, बल्कि आचरण बनाना होगा।
मुनि श्री ने कहा कि क्षमा मांगना और क्षमा करना दोनों ही सहज नहीं हैं। क्षमा मांगने के लिए अहंकार छोड़कर झुकना पड़ता है और क्षमा करने के लिए दिल बड़ा करना पड़ता है। इसलिए जीवन में यह भाव होना चाहिए—“हाथ जोड़कर क्षमा मांगूं और दिल खोलकर क्षमा करूं।”
नमक की तरह घुलें, परिवार और समाज में प्रेम बढ़ाएं
क्षमावाणी के तीसरे और चौथे सूत्र “घुलो और मिलो” की व्याख्या करते हुए मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति का व्यवहार पानी में घुलने वाले नमक जैसा होना चाहिए। नमक स्वयं को मिटाकर पानी का स्वाद बढ़ाता है। उसी प्रकार व्यक्ति को परिवार, समाज और साधु-संघ के बीच घुल-मिलकर रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म की विवेचना करना सरल है, लेकिन उसका व्यवहार में कितना पालन हो रहा है, इसका आत्ममंथन करना आवश्यक है।
सम्मेद शिखरजी स्वयं क्षमा का तीर्थ
मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि सम्मेद शिखरजी स्वयं क्षमा का तीर्थ है और भगवान पार्श्वनाथ क्षमा के आदर्श हैं।
उन्होंने बताया कि एक दिन पूर्व कुछ श्रद्धालुओं के साथ क्षमावाणी मनाने का भाव बना और विचार आया कि क्यों न तीर्थराज पर विराजमान सभी साधु-साध्वियों के साथ सामूहिक रूप से क्षमावाणी मनाई जाए। इसके बाद गुणायतन की टीम ने अल्प समय में व्यवस्थाएं कीं और विभिन्न परंपराओं के साधु-साध्वी एक मंच पर उपस्थित हुए।
उन्होंने इसे एक अनुकरणीय प्रयोग बताते हुए कहा कि ऐसी सामूहिक क्षमावाणी की परंपरा आगे भी जारी रहनी चाहिए। इससे समाज में साधु-संतों के बीच समन्वय, आत्मीयता और परस्पर सम्मान का सकारात्मक संदेश जाएगा।
आचार्य सम्भव सागर महाराज ने भेजी शुभभावना
आचार्य श्री सम्भव सागर महाराज स्वयं समारोह में उपस्थित नहीं हो सके, लेकिन उन्होंने अपनी शुभभावना और आशीर्वाद के साथ अन्य साधु-संतों को इस आयोजन में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया। मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने उनके प्रति नमन करते हुए इसे आयोजन की महत्वपूर्ण कड़ी बताया।
साधु जीवन की शोभा रत्नत्रय से
मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि साधु केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि रत्नत्रय के धनी और उसके प्रतीक होते हैं। साधु जीवन की वास्तविक शोभा रत्नत्रय से है। इसलिए सम्मेद शिखरजी में विराजमान साधु-साध्वियों की चर्या और साधना में किसी प्रकार की बाधा नहीं आनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि व्यवस्थाएं बनाने की जिम्मेदारी अपनी जगह है, लेकिन साधु को भी अपनी अवस्था और मर्यादा को पहचानना होगा। साधु अपनी अवस्था में, श्रावक अपनी अवस्था में और प्रत्येक व्यक्ति अपनी मर्यादा में रहे तो अव्यवस्था का प्रश्न ही नहीं उठेगा।
उन्होंने कहा कि साधु की मुद्रा सामान्य नहीं होती, उसके आचरण का प्रभाव व्यापक होता है। इसलिए साधु-संतों को अपनी चर्या, मर्यादा और साधुत्व की रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। वहीं श्रावकों और व्यवस्था में लगे लोगों का दायित्व है कि वे साधु-साध्वियों की रत्नत्रय आराधना में सहयोग करें।
सभी साधु-साध्वियों ने की क्षमा याचना
समारोह में उपस्थित साधु-संतों, साध्वियों और श्रद्धालुओं ने मन, वचन और काय से हुई जाने-अनजाने भूलों के लिए परस्पर क्षमा याचना की। समारोह में सभी प्रमुख साध्वियों ने भी अपने विचार रखे।
आयोजन ने यह संदेश दिया कि क्षमावाणी केवल वर्ष में एक दिन औपचारिक रूप से क्षमा मांगने का पर्व नहीं, बल्कि मन की गांठें खोलने, अहंकार को झुकाने, परस्पर घुलने-मिलने और आत्मसाधना को मजबूत करने का जीवन-संकल्प है।
कार्यक्रम का संचालन ब्र. अशोक भैया लिधौरा ने किया।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी










