पुण्य के पीछे मत पड़ो, पुण्य के कार्यों के पीछे चलें—निर्यापक मुनि श्री योगसागर जी महाराज

धर्म

पुण्य के पीछे मत पड़ो, पुण्य के कार्यों के पीछे चलें—निर्यापक मुनि श्री योगसागर जी महाराज
संज्वलन आदि चार कषायों के त्याग से ही भावलिंगी मुनि अवस्था की ओर बढ़ सकते हैं
कोटा, 26 सितंबर 2026।

शनिवार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा, पंचक एवं रत्नत्रय व्रत पूर्ण होने के पावन अवसर पर श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में प्यास होगी, तभी प्रयास होगा और जब आत्मकल्याण की सच्ची प्यास जागेगी, तभी श्रावक से मुनि बनने की दिशा में कदम आगे बढ़ेंगे।
मुनिश्री ने कहा कि संज्वलन रूप आदि चार कषायों के भावों को छोड़ने पर ही भावलिंगी मुनि की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। केवल बाहरी रूप बदलने से साधना पूर्ण नहीं होती, बल्कि अंतरंग कर्मों की निर्जरा के लिए भीतर के कषाय, ममत्व और परिग्रह को छोड़ना आवश्यक है। त्याग और संयम के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए आस्था और श्रद्धा अत्यंत उपयोगी हैं।

 

उन्होंने कहा कि संसार में हमारा बंधन मुख्य रूप से परिग्रह और उसके प्रति ममत्व के कारण है। परिग्रह केवल बड़ी-बड़ी वस्तुओं में ही नहीं, एकेंद्रिय जीवों में भी पाया जाता है। परिग्रह के पीछे मिथ्यात्व और ममत्व की भावना जुड़ी हुई है। शरीर के प्रति ममत्व ही जीव को संसार की चतुर्गति में भटकाता रहता है। इसलिए शरीर को ही अपना सब कुछ मानने की वृत्ति का निदान करना होगा। जैसे-जैसे शरीर और परिग्रह के प्रति ममत्व कम होगा, वैसे-वैसे संयम और चारित्र जीवन में सहज रूप से प्रकट होने लगेगा।

 


मुनिश्री ने कहा कि पांचों पापों का बुद्धिपूर्वक त्याग करना चाहिए। विवेकपूर्वक किए गए त्याग से पुण्य का संचय होता है और आत्मा मुक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर होती है। पुण्य को त्यागने की बात नहीं है, बल्कि पुण्य के फल के प्रति आसक्ति का त्याग करना है। पुण्य का फल पाने की लालसा न रखते हुए पुण्य के कार्य करते रहना चाहिए।
उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा—“पुण्य के पीछे मत पड़ो, पुण्य के कार्य करो।” जब पुण्य के फल की कामना समाप्त होती है और पापकर्मों की निर्जरा की भावना बढ़ती है, तब आत्मा शुद्धि की दिशा में आगे बढ़ती है।

 

व्यवहार के बिना निश्चय की प्राप्ति नहीं
मुनि श्री ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 50 के संदर्भ में व्यवहार और निश्चय चारित्र की बात समझाते हुए कहा कि जब तक व्यवहार को नहीं अपनाएंगे, तब तक निश्चय की ओर आगे बढ़ना संभव नहीं है। व्यवहार साधना का आधार है और उसी के माध्यम से निश्चय की दिशा में प्रगति होती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दूध, दही और मक्खन को व्यवहार की प्रक्रिया से जोड़कर समझा जा सकता है, जबकि घी उस प्रक्रिया की परिपक्व परिणति का प्रतीक है। इसी प्रकार व्यवहार चारित्र से आगे बढ़ते हुए साधक निश्चय चारित्र की ओर अग्रसर होता है।
मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि जैन दर्शन में सकल चारित्र, विकल चारित्र और निष्कल/पूर्ण चारित्र जैसी अवस्थाओं का निरूपण साधक की योग्यता और आध्यात्मिक स्थिति के अनुसार किया गया है। गृहस्थ के लिए संयमित जीवन, व्रत और पापों से विरक्ति व्यवहार चारित्र की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं, जबकि पूर्ण त्याग और आत्मरमण की अवस्था उच्चतर चारित्र की ओर ले जाती है।
उन्होंने कहा कि संयम केवल वस्त्र बदलने या बाहरी रूप बदलने का नाम नहीं है; संयम तो भीतर के परिणामों को बदलने का नाम है। जब मन में त्याग की सच्ची प्यास जागेगी, श्रद्धा दृढ़ होगी, पांचों पापों से विरक्ति होगी और परिग्रह के प्रति ममत्व घटेगा, तभी आत्मा के भीतर चारित्र का वास्तविक विकास प्रारंभ होगा।
मुनिश्री ने धर्मसभा को संदेश देते हुए कहा कि मनुष्य को संसार की वस्तुओं को छोड़ने से पहले वस्तुओं के प्रति अपनी आसक्ति छोड़ने का अभ्यास करना चाहिए। यही अभ्यास आगे चलकर त्याग, संयम, चारित्र और अंततः कर्मनिर्जरा का मार्ग प्रशस्त करता है।
🌿 उपवास पालना हेतु विशेष सात्त्विक आहार व्यवस्था
शिविर निदेशक श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि तप-विधियों में पारणा के नियमों के अनुसार उपवास पालना करने वाले साधकों के लिए प्रबंध कार्यकारिणी समिति द्वारा विशेष एवं सात्त्विक आहार व्यवस्था की गई।

 

उपवास पालना के दौरान साधकों की आवश्यकता एवं अनुमत आहार-विधि के अनुसार केर का पानी, मूंग दाल का पतला पानी, पानी वाली उकाली, दूध वाली उकाली, मूंग दाल, मूंग मोगर दाल, हल्का मीठा—हलवा, मुनक्का/दाख, सादा गरम पानी, अनुमत साधकों के लिए नारियल पानी, छाछ, नींबू पानी, सादा खिचड़ी/दलिया एवं उबली हुई सब्जी आदि की व्यवस्था रखी गई।
पारणा के नियमों एवं साधकों की अनुमत आहार-विधि का विशेष ध्यान रखते हुए व्यवस्था की गई। उपवास करने वाले साधकों का सम्मानपूर्वक अभिनंदन भी किया गया।
इससे पूर्व कल सायंकाल दस दिवसीय योग साधना एवं संस्कार शिविर का भव्य समापन हुआ। इस अवसर पर सभी शिविरार्थियों को श्री आदिनाथ भगवान के फोटो का स्मृति-चिह्न प्रदान किया गया।
धर्मसभा में उपस्थित शिविरार्थियों एवं श्रावक-श्राविकाओं ने मुनिश्री के मंगल प्रवचन का श्रद्धापूर्वक श्रवण किया और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
🌺 आज के प्रमुख पुण्यार्जक
विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से किया पुण्यार्जन
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की सपरिवार पूजन कर्ता परिवार द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया। इसमें देवकरण-सुलोचना, सुनील-अतिशा एवं समस्त कंसल परिवार शामिल रहे।
कलश स्थापना का पुण्यार्जन भी श्रद्धालु परिवार द्वारा किया गया।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमान राजेश, सोनल एवं ओमांशी सेठिया परिवार; श्रीमती सुशीला बाई-अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार; श्रीमान देवकरण, श्रीमती सुलोचना एवं सुनील कंसल परिवार तथा श्रीमान राजेंद्र, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार द्वारा किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रद्धालुओं द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया।
श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यार्जन करने का सौभाग्य कमलेश जी सोगानी को प्राप्त हुआ।
श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य धर्मचंद-हेमलता-दीक्षा परिवार को प्राप्त हुआ।
मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
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🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश
**“पुण्य के पीछे मत पड़ो, पुण्य के कार्य करो।
पुण्य के फल की आसक्ति छोड़कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ें।”**
आज के प्रवचन का सार
आत्मकल्याण की सच्ची प्यास ही साधना का प्रथम कदम है। संज्वलन आदि चार कषायों, ममत्व और परिग्रह के त्याग से संयम एवं चारित्र का विकास होता है। व्यवहार साधना के माध्यम से निश्चय की दिशा में आगे बढ़ते हुए पुण्य के फल की आसक्ति छोड़कर आत्मशुद्धि एवं कर्मनिर्जरा की भावना को जीवन में अपनाना चाहिए।

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

 

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