सूरज की तपन शरीर को झुलसाती है, गुरु का तप जीवन को निखारता है — आर्यिका सुप्रज्ञमति माताजी
उत्तम तप धर्म के अवसर पर आर्यिका माताजी ने बताया तप का महत्व, आचार्य सन्मति सागर जी के तपोबल का किया प्रेरक स्मरण
धामनोद।
दशलक्षण पर्युषण पर्व के सातवें दिन उत्तम तप धर्म के अवसर पर दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा का आयोजन हुआ। आर्यिका 105 सुप्रज्ञमति माताजी ने अपने मंगल प्रवचन में तप की महिमा बताते हुए कहा कि सूरज भी तपता है और गुरु भी तपते हैं, लेकिन दोनों की तपन में बहुत बड़ा अंतर है। सूर्य की तपन हम सहन नहीं कर पाते, जबकि गुरु का तप हमारे जीवन को सन्मार्ग पर ले जाकर आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
परम पूज्य चतुर्थ पट्टाचार्य 108 श्री सुनील जी महाराज की शिष्या आर्यिका सुप्रज्ञमति माताजी ने कहा कि सूर्य कुछ समय के लिए तपता है, लेकिन तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज वर्षों तक कठोर तपस्या में लीन रहे। तप की अपनी महिमा है और तप मनुष्य के जीवन को भीतर से निखारने का माध्यम है।

मच्छरों का उपसर्ग भी नहीं डिगा सका गुरु का ध्यान
माताजी ने आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज के सम्मेद शिखरजी प्रवास का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक बार आचार्य श्री तेरहपंथी कोठी में विराजमान थे। वहां मुनि संघ के लिए जिन कमरों में व्यवस्था की गई थी, वहां बहुत अधिक मच्छर थे। जब संघ के मुनिराज आचार्य श्री को देखने पहुंचे तो उनके शरीर पर असंख्य मच्छर इस प्रकार बैठे हुए थे, मानो काला कालीन बिछा हो।
आचार्य श्री को चटाई का भी त्याग था। इसके बावजूद वे बिना शरीर को हिलाए-डुलाए मच्छरों के उपसर्ग को सहन करते रहे। माताजी ने कहा कि इतनी पीड़ा और कष्ट को सहज भाव से सहन करने वाले ऐसे तपस्वी महापुरुषों को नमन है।
बाह्य और अंतरंग तप के बताए छह-छह भेद
आर्यिका माताजी ने बताया कि तप दो प्रकार का होता है—बाह्य तप और अंतरंग तप। दोनों के छह-छह भेद बताए गए हैं।
उन्होंने कहा कि प्रायश्चित के माध्यम से अपनी गलतियों और पापों का पश्चाताप करना चाहिए। विनय के द्वारा गुरुजनों और विद्वानों के प्रति आदर-सम्मान रखना चाहिए। वैयावृत्ति अर्थात गुरु एवं संतों की सेवा करना, स्वाध्याय के माध्यम से धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर उसे जीवन में उतारना, ध्यान द्वारा मन को एकाग्र कर आत्मचिंतन करना तथा व्युत्सर्ग के माध्यम से शरीर के प्रति आसक्ति, मोह और ममता को कम करना चाहिए।
बाह्य तप के अंतर्गत अनशन, उनोदर, वृत्ति परिसंख्यान, रस परित्याग, काय क्लेश और प्रतिसंलीनता बताए गए हैं। माताजी ने कहा कि उपवास एवं भोजन का त्याग, आवश्यकता से कम भोजन करना, आहार के संबंध में नियम लेना, स्वादिष्ट रसों का त्याग, शरीर को सहनशील बनाना तथा इंद्रियों और कषायों पर नियंत्रण करना भी तप का स्वरूप है।
केवल मूंग की दाल के पानी पर की 108 वंदना
माताजी ने तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज के तप का उदाहरण देते हुए बताया कि उन्होंने केवल मूंग की दाल के पानी के सहारे सम्मेद शिखरजी की 108 वंदना की थी। यह उनके अद्भुत तपोबल और आत्मसंयम की शक्ति का परिचायक है। उन्होंने कहा कि ऐसी साधना सामान्य मनुष्य के लिए अत्यंत कठिन है और यह महान तपस्वियों के तपोबल से ही संभव होती है।
देव, शास्त्र और गुरु का सहारा लेकर आत्मकल्याण की ओर बढ़ें
आर्यिका सुप्रज्ञमति माताजी ने कहा कि जब तक आत्मानुभूति की स्थिति प्राप्त नहीं होती, तब तक देव, शास्त्र और गुरु का सहारा लेना आवश्यक है। जिनवाणी का संदेश है कि प्रत्येक जीव में अनंत गुण विद्यमान हैं। भगवान किसी को कुछ देते नहीं और न ही किसी से कुछ लेते हैं; आत्मा के गुणों को स्वयं की साधना से प्रकट करना होता है।
उन्होंने कहा कि बिना तप के आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। देव, शास्त्र और गुरु साधन हैं और तप साधक को भीतर से निखारता है। देशना और लब्धि के बिना सम्यक्त्व की प्राप्ति कठिन है तथा देव, शास्त्र और गुरु के मार्गदर्शन के बिना आत्मोद्धार का मार्ग सहज नहीं बनता।
श्रद्धा और भक्ति से हुआ अभिषेक, शांतिधारा व पूजन
इससे पूर्व प्रातः आर्यिका सुप्रज्ञमति माताजी के सानिध्य में भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, आरती एवं पूजन-विधान विधि-विधानपूर्वक संपन्न हुआ। समाजजनों ने पूरे भक्तिभाव के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। मंदिर परिसर में दिनभर श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना रहा।
धामनोद से दीपक प्रधान की रिपोर्ट।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी।




