हाडोती के इतिहास में वर्ष 2008 विजयदशमी का दिन इतिहास के पन्नों पर अमिट है। कोटा की नगरी वैराग्य की धरती बन गई थी

धर्म

हाडोती के इतिहास में वर्ष 2008 विजयदशमी का दिन इतिहास के पन्नों पर अमिट है। कोटा की नगरी वैराग्य की धरती बन गई थी
संस्मरण
कोटा।
राजस्थान प्रदेश में हाडोती का एक नगर कोटा जो औद्योगिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र के लिए जाना जाता है। और विजयादशमी के पर्व के रूप में कोटा को जाना जाता रहा है लेकिन वर्ष 2008 से विजयदशमी के दिन से कोटा को धर्म नगरी के रूप में एवं वैराग्य की नगरी के रूप में जाने जाने लगा है।

 

जी हां हो भी क्यों ना इस दिन वर्ष 2008 में इस युग की सर्वाधिक दीक्षा प्रदात्री गणिनी आर्यिका 105 विशुद्ध मति माताजी द्वारा अनेक बहनों को संयम के पद पर अग्रसर करते हुए उन्हें मोक्ष मार्ग पर प्रशस्त करते हुए जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान की थी।

संपूर्ण विश्व की निगाहें एक टक गुमानपुरा मल्टीपरपज स्कूल पर टिकी हुई थी मैं स्वयं भी इन पलों को साक्षात गुमानपुरा मल्टीपरपज स्कूल से देख रहा था इन बहनों को देख हाथों से कैश लोचन करते देख मैं स्वयं भी व्यथित एवं व्याकुल हो उठा

 

 

 

सचमुच त्याग तपस्या एवं वैराग्य का अद्भुत उदाहरण कोटा नगरी में दिख रहा था। हजारों की संख्या में भक्तगण मौजूद रहे। भारी गर्मी के बावजूद भी लोगों का उत्साह कम नहीं था। इस दीक्षा के पल में सबसे विशिष्ट बात यह थी कि मां और बेटी दोनों ने एक साथ गुरु मां से दीक्षा ली थी और उन्ही में से एक ब्रह्मचारिणी आभा दीदी जिन्हें आज हम पट्ट गणिनी आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी के रूप में देख रहे हैं। सचमुच गुरु मां की दूर दृष्टि ही थी कि उन्हें दीक्षा प्रदान की और आज वह जैन धर्म की प्रभावना कर रही हैं अपने त्याग संयम के द्वारा अनेकों को मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करते हुए सभी को पतित से पावन बनाने का कार्य कर रही है। मैं स्वयं रामगंजमंडी से हूं और यह हमारे लिए गौरव का पल है कि पूज्य माताजी के द्वारा दी गई दीक्षा का प्रथम दीक्षा दिवस मनाने का सौभाग्य रामगंज मंडी नगर को प्राप्त हुआ था। यह कार्यक्रम अपने आप में एक एतिहासिक कार्यक्रम था। वर्ष 2008 से पूज्य आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी ने संयम के पद पर बढ़ते हुए जैन धर्म की प्रभावना को एक उच्चतम शिखर पर पहुंचाया है। उन्होंने नियम संयम के साथ अपनी मानव देह को तो धन्य किया ही, साथ साथ ही साथ उन्होंने पूज्य गुरुमां विशुद्ध मति माताजी की अनंत सेवा की जो अपने आप में एक अनुपम उदाहरण है। शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण यदि हमें देखना है तो वह पूज्य माताजी में साफ देखने को मिलता है।
पूज्य गुरु मां द्वारा जो इन्हें नाम दिया गया है वह निश्चित रूप से सार्थकता वाला नाम है पूज्य माताजी निश्चित रूप से विशिष्ट ज्ञान की धारी हैं। और दूर दृष्टि वाली है। मैं तो कहूंगा कि मुझे तो धर्म की प्रभावना की और अग्रसर करने के लिए पूज्य माताजी ने ही प्रेरित किया। इसी का ही परिणाम रहा की उन्होंने अपने दृढ़ परिश्रम धार्मिक ज्ञान एवं उनके साथ में संलग्न अन्य माताजी को भी उन्होंने हमेशा साथ रखते हुए धर्म साधना की ओर आगे बढ़ाया जिसका परिणाम यह हुआ कि पूज्य माताजी ने उन्हें पट्ट गणिनी पद से भी सुशोभित किया। जो पूज्य माताजी भली-भांति निभा रही है। हम तो यही कामना करते हैं कि पूज्य माताजी आप दीर्घायु हो, आपका रत्नत्रय और फलीभूत हो।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमासजी

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