पर्याप्तता का अभ्यास करें, जिम्मेदारी निभाएं और अनावश्यक पकड़ छोड़ें : मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज
जीवन की बैलेंसशीट में धन-सम्पत्ति के साथ शांति, संतोष और संबंधों का भी हिसाब जरूरी
गिरिडीह (श्री सम्मेदशिखरजी)।
दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर श्री सम्मेदशिखरजी में धर्म, आत्मचिंतन और साधना का वातावरण बना हुआ है। मध्याह्न प्रवचन में राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने उत्तम शौच धर्म की अत्यंत व्यावहारिक व्याख्या करते हुए कहा कि मनुष्य का असंतोष वस्तुओं की कमी से कम और बढ़ती इच्छाओं, तुलना, प्रशंसा, अधिकार तथा नियंत्रण की भूख से अधिक पैदा होता है। इसलिए जीवन में यह प्रश्न करना जरूरी है—“मुझे और कितना चाहिए और मेरे लिए कितना पर्याप्त है?”
मुनि श्री ने कहा कि “वस्तु हाथ में रहे, लेकिन मन में न बैठे और धन साधन रहे, साध्य न बने—यही संतोष की दिशा है।”
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’, गुणायतन ने बताया कि मुनिश्री ने अपने प्रवचन में श्रद्धालुओं के सामने कई प्रयोगात्मक प्रश्न रखे और उनके माध्यम से जीवन की वास्तविकता को समझाया। उन्होंने कहा कि एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा खड़ी हो जाती है। इसलिए इच्छाओं की पूर्ति में नहीं, बल्कि इच्छाओं के संयम में संतोष है।
दूसरों से तुलना ही असंतोष की बड़ी वजह
मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति अक्सर अपने प्रतिस्पर्धी या आसपास के लोगों को देखकर अपनी आवश्यकताएं तय करता है। परिणाम यह होता है कि जो कुछ उसके पास है, वह भी कम लगने लगता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन के लिए चार वाक्य दिए—
“मेरे पास इतना धन पर्याप्त है कि…”
“इतनी सुविधा पर्याप्त है कि…”
“परिवार से मेरी इतनी अपेक्षा पर्याप्त है कि…”
“समाज से मुझे इतना सम्मान पर्याप्त है कि…”
इन प्रश्नों के उत्तर दूसरों को नहीं, बल्कि स्वयं को देने हैं।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को यह भी देखना चाहिए कि उसके भीतर वस्तु, प्रशंसा, अधिकार और नियंत्रण में सबसे बड़ी भूख किसकी है। फिर स्वयं से पूछें कि जिस भूख के पीछे सबसे अधिक दौड़े, उसने क्या दिया और उसकी कीमत क्या चुकानी पड़ी।
जीवन की भी बनाएं बैलेंसशीट
मुनिश्री ने कहा कि व्यापारी वर्ष के अंत में लाभ-हानि का हिसाब करता है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन की भी बैलेंसशीट बनानी चाहिए। केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि क्या पाया, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि उसे पाने के लिए क्या खोया।
धन मिला तो कितना समय और श्रम गया, प्रतिष्ठा मिली तो कितनी चिंता बढ़ी और अपनी बात मनवाने की कोशिश में कितने संबंध प्रभावित हुए—इन सवालों से जीवन की वास्तविक बैलेंसशीट सामने आ सकती है।
कई बार धन, पद और प्रतिष्ठा के बदले व्यक्ति शांति, संतोष, समय और संबंधों की कीमत चुका देता है। इसलिए जीवन की सही बैलेंसशीट वही है, जिसमें बाहरी उपलब्धियों के साथ भीतर की शांति का भी हिसाब हो।
नाम नहीं, काम से प्यार हो
प्रशंसा की भूख पर मुनि श्री ने कहा कि अच्छा काम करने के बाद यदि व्यक्ति चाहता है कि उसका नाम हो और लोग उसकी प्रशंसा करें, तो वहां अपेक्षा मौजूद है। इसके विपरीत यदि पूरी निष्ठा से काम करने के बाद किसी को पता भी न चले और फिर भी भीतर आनंद बना रहे, तो यह निष्काम भाव की दिशा है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को नाम कमाने के बजाय काम को महत्व देना चाहिए। भगवान महावीर और संतों ने नाम की अपेक्षा नहीं की, लेकिन उनके जीवन और कार्यों के कारण आज भी उनका स्मरण किया जाता है। इसलिए जीवन का भाव होना चाहिए—
“नाम नहीं, काम से प्यार।”
जिम्मेदारी छोड़ें नहीं, नियंत्रण छोड़ें
मुनि श्री ने अधिकार और नियंत्रण के अंतर को भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि पद या जिम्मेदारी छोड़ देना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन पद का भाव और नियंत्रण की मानसिकता छोड़ना कठिन होता है।
व्यापार बेटे को सौंपने के बाद भी हर निर्णय अपने अनुसार करवाना, परिवार की जिम्मेदारी बच्चों को देने के बाद भी हर काम अपनी इच्छा से करवाना—यह अधिकार की पकड़ को दर्शाता है। मार्गदर्शन देना उचित है, लेकिन “मैंने जैसा कहा है, वैसा ही होगा” वाली मानसिकता संबंधों में तनाव पैदा कर सकती है।
उन्होंने कहा—
“जिम्मेदारी छोड़नी नहीं है, अनावश्यक नियंत्रण छोड़ना है।”
बच्चों को दायित्व सौंपें, उन्हें अपने अनुभव से आगे बढ़ने दें और आवश्यकता पड़ने पर मार्गदर्शन करें। अधिकार सौंपें, नियंत्रण नहीं।
पकड़ो जिम्मेदारी, छोड़ो नियंत्रण
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को “पकड़ो या छोड़ो” का सरल अभ्यास भी कराया। उन्होंने कहा—
– ईमानदारी पकड़ें, शिकायत छोड़ें।
– परिवार की जिम्मेदारी पकड़ें, हर निर्णय पर अधिकार छोड़ें।
– धर्म की नियमितता पकड़ें, प्रशंसा की अपेक्षा छोड़ें।
– अनुभव साझा करें, अपनी पद्धति थोपने की जिद छोड़ें।
– प्रेम पकड़ें, नियंत्रण छोड़ें।
उन्होंने कहा कि यही धर्म का व्यावहारिक स्वरूप है।
यदि जीवन के केवल पांच वर्ष शेष हों तो?
जीवन की प्राथमिकताओं पर चिंतन कराते हुए मुनि श्री ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को पता चले कि उसके जीवन में केवल पांच वर्ष शेष हैं, तो उसकी प्राथमिकताएं बदल जाएंगी। जिन बातों पर आज विवाद हो रहा है, उनका महत्व कम हो जाएगा और परिवार, संबंध तथा सार्थक कार्य अधिक महत्वपूर्ण लगने लगेंगे।
उन्होंने कहा कि जब पांच वर्ष शेष होने की कल्पना हमारी प्राथमिकताएं बदल सकती है, तो यह समझना चाहिए कि जीवन की कोई निश्चित गारंटी नहीं है। इसलिए जो जरूरी है, उसे आज ही महत्व देना चाहिए।
रात को एक मिनट करें आत्मपरीक्षण
मुनि श्री ने प्रतिदिन रात को केवल एक मिनट आत्मपरीक्षण करने की प्रेरणा देते हुए चार प्रश्न बताए—
मेरी भूख क्या है?
मेरी पकड़ किस चीज पर है?
मेरे लिए पर्याप्त क्या है?
आज मुझे किस पकड़ को छोड़ना है?
उन्होंने कहा कि नियमित रूप से इस अभ्यास को करने से धीरे-धीरे भीतर परिवर्तन आ सकता है।
मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि संदेश धन या वस्तुओं को छोड़ने का नहीं, बल्कि उनके प्रति मानसिक निर्भरता छोड़ने का है। जो आवश्यक है उसे जिम्मेदारी से निभाएं, जो पर्याप्त है उसमें संतोष रखें और जो अनावश्यक रूप से मन को बांध रहा है, उसे धीरे-धीरे छोड़ते जाएं।
उत्तम शौच धर्म का वास्तविक संदेश यही है कि जीवन में अनावश्यक पकड़, कामना और अपेक्षा के स्थान पर संतोष आए और व्यक्ति नाम की चाह के बिना अपने कर्म को श्रेष्ठ बनाने में जुटा रहे।
(अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ से प्राप्त जानकारी के आधार पर)
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312

