पर्वराज पर्युषण का चौथा चरण : उत्तम शौच धर्म “जिसे चाहो, उससे कुछ मत चाहो; लोभ से मुक्ति का मार्ग ही उत्तम शौच” — अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी

धर्म

पर्वराज पर्युषण का चौथा चरण : उत्तम शौच धर्म “जिसे चाहो, उससे कुछ मत चाहो; लोभ से मुक्ति का मार्ग ही उत्तम शौच” — अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी

सोनकच्छ।

पुष्पगिरी तीर्थ सोनकच्छ में पर्वराज पर्युषण महापर्व के चौथे चरण उत्तम शौच धर्म के अवसर पर धर्मसभा का आयोजन हुआ। पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के सानिध्य में वर्षायोग के लिए विराजमान व्रत चक्रवर्ती पट्ट विभूषण अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पियूष सागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए

 

 

धर्मसभा को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने उत्तम शौच धर्म का सरल अर्थ बताते हुए कहा— “जिसे चाहो, उससे कुछ मत चाहो।” उन्होंने कहा कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या उसकी लोभ-वृत्ति है। संसार में असंख्य योनियों में मानव ही ऐसा जीव है, जो धन कमाने के लिए निरंतर प्रयास करता है। अन्य जीव बिना धन कमाए भी प्रकृति के सहारे अपना जीवन जीते हैं, लेकिन मनुष्य धन अर्जित करने के बाद भी संतुष्ट नहीं हो पाता।

आचार्यश्री ने कहा कि लोभ से मुक्ति का मार्ग संतोष है और संतोष ही उत्तम शौच धर्म का आधार है। संतोषी व्यक्ति साधनों की कमी के बावजूद सुखी रह सकता है, जबकि लोभी व्यक्ति समृद्धि के बीच भी चिंतित और परेशान रहता है। जीवन में परिस्थितियां कैसी भी हों, हमें दुःख में से सुख खोजकर जीना सीखना चाहिए। बड़े से बड़े दुःख में भी छोटे-छोटे सुख के चिराग छिपे होते हैं। जो व्यक्ति उन सुखों को पहचानकर जीवन जीता है, उसके जीवन में सुख, शांति, आनंद और प्रेम का संचार होता है।

 

 

धन आवश्यक है, लेकिन धन ही सब कुछ नहीं

आचार्य श्री ने कहा कि “मैं धन का विरोधी नहीं हूं। धन होना चाहिए, लेकिन केवल धन के लिए जीवन नहीं गंवाना चाहिए। जिंदगी में धन कुछ हो सकता है, बहुत कुछ हो सकता है, लेकिन धन सब कुछ नहीं हो सकता।”

उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे धन बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे भोग-विलास और ऐशो-आराम के साधन भी बढ़ते जाते हैं। यदि इन साधनों पर नियंत्रण न हो तो यही सुविधाएं मनुष्य के अमन-चैन को छीन सकती हैं। उत्तम शौच धर्म के अभाव में मनुष्य की अच्छी-खासी जिंदगी भी भोग-विलास की दौड़ में पतनोन्मुख हो सकती है।

 

 

उन्होंने कहा कि जीवन को उन्नत और समुन्नत बनाने के लिए केवल धन नहीं, बल्कि धर्म की भी आवश्यकता है। मनुष्य कितना भी धन कमा ले और कितना भी धन जोड़ ले, अंततः वह धन उसके साथ नहीं जाता। इसलिए उस मार्ग को अपनाना चाहिए जो जीवन के साथ ही नहीं, बल्कि आत्मकल्याण के मार्ग पर भी साथ दे।

 

 

आचार्यश्री ने संदेश देते हुए कहा—

“जो अनंत सुख तक साथ दे, उसका दामन थामना ही उत्तम शौच धर्म है।”

धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर प्रवचन का लाभ लिया तथा उत्तम शौच धर्म के संदेश को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।

जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पियूष कासलीवाल, औरंगाबाद

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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