क्रोध को दबाने की नहीं, उसे देखने और समझने की जरूरत—आचार्य प्रसन्न सागरजी
पर्वों के पर्वराज पर्युषण महापर्व का प्रथम चरण ‘उत्तम क्षमा’ से शुरू, पुष्पगिरी तीर्थ में गूंजा आत्मशुद्धि और क्षमा का संदेश
सोनकच्छ।
पर्वों के पर्वराज पर्युषण महापर्व का शुभारंभ बुधवार को पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ में धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के बीच हुआ। प्रथम दिवस ‘उत्तम क्षमा धर्म’ को समर्पित रहा। धर्मसभा में अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज ने श्रद्धालुओं को क्रोध, कषाय, बैर और क्षमा के गहरे आध्यात्मिक अर्थ से परिचित कराया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि जीवन में अपमान, उपेक्षा और कषाय के प्रसंग आते रहते हैं। कभी-कभी परिस्थितियां क्रोध के लिए अनुकूल दिखाई देती हैं, लेकिन क्षमा के लिए वर्ष के बारहों महीने और चौबीसों घंटे अवसर उपलब्ध है। आवश्यकता केवल अपने भीतर झांकने की है।

‘क्रोध किया क्यों?’—यह सवाल हर व्यक्ति खुद से पूछे
आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि रोजमर्रा के जीवन में अक्सर व्यक्ति क्रोध करने के बाद स्वयं से कहता है—मुझे क्रोध नहीं करना था, फिर मैंने क्रोध क्यों किया? जरा-सा निमित्त मिलते ही मनुष्य अपने विवेक पर नियंत्रण खो बैठता है और बाद में पश्चाताप करता है।
उन्होंने कहा कि यह सिलसिला केवल पश्चाताप तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अब आवश्यकता है प्रायश्चित, आत्मचिंतन और आत्मनिरीक्षण की। व्यक्ति को यह समझना होगा कि क्रोध क्यों आया, उसका परिणाम क्या हुआ और उससे स्वयं तथा दूसरों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा।
क्रोध को दबाना नहीं, उसे देखना और समझना जरूरी
आचार्य श्री ने कहा कि क्रोध आ जाना मात्र समस्या नहीं है, बल्कि उसे मन में संजोकर रखना और बैर की गांठ बांध लेना अधिक घातक है। क्रोध जब बदले की भावना में बदल जाता है तो व्यक्ति के भीतर वैरभाव को जन्म देता है।
जैन दर्शन में वर्णित कमठ के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने समझाया कि बदले की भावना जीव को लंबे समय तक संसार में भटकाने वाली बन सकती है। इसलिए क्रोध के साथ-साथ उसके पीछे छिपे वैर और प्रतिशोध के भाव को पहचानना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि क्रोध को केवल दबाने की कोशिश करना समाधान नहीं है। क्रोध को दबाने के बजाय उसे देखना, जानना और उसके कारण को समझना आवश्यक है। भीतर दबा हुआ गुबार कभी भी विस्फोट का रूप ले सकता है। इसलिए अपने मन में उठने वाले क्रोध को साक्षी भाव से समझना आत्मशुद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
उत्तम क्षमा केवल शब्द नहीं, जीवन की साधना है
आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि जो व्यक्ति अपने क्रोध के दुष्परिणामों को समझ लेता है, वही वास्तविक अर्थों में उत्तम क्षमा को धारण करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
क्षमा केवल किसी से ‘माफ कर दिया’ कह देने का नाम नहीं है, बल्कि यह भीतर से क्रोध, अहंकार और वैरभाव को समाप्त करने की साधना है। दूसरों की भूलों को क्षमा करने के साथ अपने भीतर झांकना और अपनी भूलों को स्वीकार करना भी क्षमा धर्म का महत्वपूर्ण पक्ष है।
आचार्य श्री ने संदेश देते हुए कहा—
«“क्रोध, कर्म, कर्ज और रोग को जड़ से मिटाना ही उत्तम क्षमा धर्म है।”»
पर्युषण महापर्व के प्रथम दिवस पुष्पगिरी तीर्थ में उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के धर्मोपदेश का श्रवण करते हुए आत्मचिंतन, क्षमा भाव और कषायों से दूर रहने का संकल्प लिया। धार्मिक अनुष्ठानों, साधना और धर्मसभा के चलते पूरे तीर्थ परिसर में भक्तिमय एवं आध्यात्मिक वातावरण बना रहा।
प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पियूष कासलीवाल
औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312






