क्षमा रिश्तों में, संयम जीवनशैली में और अहिंसा शब्दों में उतरे, तभी पर्व सार्थक : मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज
दशलक्षण पर्व पर आत्मशुद्धि का संदेश—मन की सफाई के साथ व्यवहार में बदलाव का आह्वान
मधुबन।
हम जीवन में अनेक पर्व मनाते हैं, लेकिन क्या कभी उन पर्वों से स्वयं के भीतर झांकने का प्रश्न भी पूछा है? मोबाइल की मेमोरी भर जाए तो हम अनावश्यक डाटा तुरंत हटा देते हैं, लेकिन मन में वर्षों से जमा क्रोध, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, अहंकार और अपमान की स्मृतियों को कब हटाएंगे?
दशलक्षण पर्व इसी आत्ममंथन का अवसर है। मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज के संदेश का सार यही है कि पर्व केवल पूजा-पाठ और धार्मिक क्रियाओं तक सीमित न रहे, बल्कि क्षमा रिश्तों में, संयम जीवनशैली में और अहिंसा हमारे शब्दों एवं व्यवहार में दिखाई दे। तभी पर्व वास्तव में सार्थक होगा।
धर्म को व्यापार, परिवार और सामाजिक जीवन में उतारना कठिन अवश्य है, लेकिन दशलक्षण पर्व इसी कठिन साधना का अवसर देता है। धर्म का अंतिम प्रमाण केवल धार्मिक क्रियाएं नहीं, बल्कि व्यक्तित्व में आया सकारात्मक परिवर्तन है। पर्व कैलेंडर पर आता है और चला जाता है, लेकिन यदि उसके संस्कार स्वभाव में उतर जाएं तो उनका प्रभाव कभी समाप्त नहीं होता।
क्षमा : संदेश नहीं, मन का बोझ उतारना
भूल स्वीकार कर क्षमा मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस है। क्षमा केवल मोबाइल की कॉन्टेक्ट लिस्ट में संदेश भेजने तक सीमित न रह जाए। हजार लोगों को क्षमा संदेश भेजने से पहले उस व्यक्ति से क्षमा मांगना अधिक सार्थक है, जिसके नाम के साथ आज भी मन में शिकायत जुड़ी हुई है।
सच्ची क्षमा वही है, जिसमें मन शिकायत के बोझ से मुक्त हो जाए।
विनम्रता : उपलब्धियों के बाद व्यवहार की परीक्षा
धन, पद, प्रतिष्ठा और ज्ञान प्राप्त होना अपने आप में बुरा नहीं है। असली प्रश्न यह है कि उपलब्धियां मिलने के बाद हमारा व्यवहार कैसा हो गया?
विनम्रता की वास्तविक परीक्षा किसी बड़े व्यक्ति के सामने नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के सामने होती है जो हमसे कमजोर या कम सामर्थ्यवान है। उपलब्धियां बढ़ें तो व्यवहार में नम्रता भी बढ़नी चाहिए।
सत्य : झूठ न बोलना ही नहीं, असत्य को रोकना भी
डिजिटल युग में सत्य की चुनौती पहले से कहीं बड़ी हो गई है। बिना जांचे किसी समाचार या संदेश को आगे बढ़ाना किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकता है।
इसलिए सत्य केवल झूठ न बोलने तक सीमित नहीं है। बिना सत्यापन के असत्य को आगे न बढ़ाना भी सत्य की साधना है।
आर्जव : स्क्रीन और वास्तविक जीवन के बीच दूरी न हो
जैन दर्शन सरलता और निष्कपटता को महत्व देता है। मन में जो हो, वही वचन और व्यवहार में दिखाई दे—यही आर्जव है।
सोशल मीडिया ने अपनी छवि बनाने की असाधारण सुविधा दे दी है, लेकिन प्रश्न यह है कि स्क्रीन पर दिखाई देने वाला व्यक्तित्व और वास्तविक जीवन का व्यक्तित्व कितना एक है?
सरलता का अर्थ भोला होना नहीं, बल्कि व्यक्तित्व में दोहरापन न होना है।
संयम : जरूरत और इच्छा के बीच अंतर समझना
हर समस्या का समाधान केवल कानून से नहीं होता। कुछ समाधान हमारी जीवनशैली से निकलते हैं।
कोई वस्तु खरीदने से पहले यदि व्यक्ति स्वयं से पूछे—“मुझे इसकी आवश्यकता है या यह केवल मेरी इच्छा है?”—तो दोनों के बीच का अंतर समझ में आने लगेगा और वहीं से संयम की शुरुआत होगी।
अपरिग्रह केवल आध्यात्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक जीवन-मूल्य भी है।
तप : भोजन का उपवास ही नहीं, विकारों का भी उपवास
आत्मसंयम और आत्मशुद्धि के लिए उपवास, एकासन, आयंबिल सहित अनेक तप-साधनाएं की जाती हैं।
भोजन का उपवास शरीर को अनुशासित करता है, लेकिन विकारों का उपवास व्यक्तित्व को शुद्ध करता है।
तप का उद्देश्य केवल यह नहीं कि हमने कितना छोड़ा, बल्कि यह भी है कि हमने अपने भीतर से क्या घटाया—क्रोध, अहंकार, लोभ, आसक्ति या कोई अन्य विकार।
त्याग : सबसे बड़ा त्याग ‘मैं’ का
त्याग का अर्थ सब कुछ छोड़कर चले जाना ही नहीं है। अपनी आय में जरूरतमंद के लिए स्थान बनाना भी त्याग है।
सबसे बड़ा त्याग केवल धन का नहीं, बल्कि अपने ‘मैं’ का है। रिश्ते बचाने के लिए बहस में शांत हो जाना, परिवार की खुशी के लिए अपनी जिद छोड़ देना और किसी दूसरे को श्रेय दे देना भी त्याग के ही रूप हैं।
अपरिग्रह : घर ही नहीं, मन को भी हल्का करें
परिग्रह केवल वस्तुओं का नहीं होता। स्मृतियों, आग्रहों, अपेक्षाओं और शिकायतों का परिग्रह भी मन को भारी करता है।
इस पर्व पर घर की ऐसी अनुपयोगी वस्तुएं, जो किसी दूसरे के काम आ सकती हैं, जरूरतमंद तक पहुंचाने का संकल्प लिया जा सकता है। साथ ही मन में वर्षों से जमा कम से कम एक शिकायत को हमेशा के लिए विदा करने का प्रयास भी किया जा सकता है।
घर की सफाई से घर हल्का होता है, लेकिन मन की सफाई से जीवन।
इस दशलक्षण पर्व पर एक संकल्प
इस बार पर्व मनाने के साथ स्वयं से कुछ प्रश्न भी पूछें—
क्या मैंने किसी से क्षमा मांगी?
क्या मेरे व्यवहार में विनम्रता आई?
क्या मैंने असत्य को आगे बढ़ने से रोका?
क्या मेरी ऑनलाइन और वास्तविक छवि एक है?
क्या मैंने अपनी इच्छाओं पर संयम रखा?
क्या मैंने किसी विकार को कम किया?
क्या मैंने किसी रिश्ते के लिए अपना ‘मैं’ छोड़ा?
क्या मैंने वस्तुओं के साथ मन की किसी शिकायत का भी त्याग किया?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर हमारे व्यवहार में दिखाई देने लगें, तो यही दशलक्षण पर्व की वास्तविक सार्थकता होगी।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 992974

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