पांचों इंद्रियों के विषय भोगों का त्याग ब्रह्मचर्य हैं। ब्रह्मचर्य अमृत है आचार्य श्री वर्धमान सागर जीनगर के युवा ने 10 उपवास के साथ आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लियाश्री वासु पूज्य भगवान का निर्वाण लाडू चढ़ाया

धर्म

पांचों इंद्रियों के विषय भोगों का त्याग ब्रह्मचर्य हैं। ब्रह्मचर्य अमृत है आचार्य श्री वर्धमान सागर जीनगर के युवा ने 10 उपवास के साथ आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लियाश्री वासु पूज्य भगवान का निर्वाण लाडू चढ़ाया

टोंक ब्रह्मचर्य व्रत सहित सभी दस धर्म आत्म संक्रांति के पर्व हैं संक्रांति का मतलब संक्रमण अर्थातसे होता है इस प्रकार धर्म संस्कार से जीवन में परिवर्तन होता है इन पर्वों से राग से वैराग्य की ओर पर्व मनाया जाता है ।आज ब्रह्मचर्य धर्म के दिन वासुपूज्य भगवान जो की प्रथम बाल ब्रह्मचारी तीर्थंकर थे उनका मोक्ष कल्याणक आप सभी ने निर्वाण लाडू चढ़ाकर मनाया है। जिस प्रकार दावानल जंगल की आग को कई दिनों बाद मेघ ही बुझाने में समर्थ है उसी प्रकार विषय कषाय के दावानल में लिप्त आत्मा से यह 10 धर्म रूपी मेघ है जो बुझाने में समर्थ है। विगत दिनों दस धर्मों के भाव,उपाय,सार और मुक्ति का मार्ग बताया गया हैं ब्रह्मचर्य अर्थात आत्मा में रमण आत्मा में चर्या से है यह धर्म देशना 10 लक्षण पर्व के अंतिम ब्रह्मचर्य धर्म और इंद्र ध्वज विधान के अवसर पर धर्म सभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट की ।राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि 24 में 5 तीर्थंकर बाल ब्रह्मचारी थे जिसमें वासु पूज्य भगवान प्रथम और महावीर स्वामी अंतिम तीर्थंकर रहे। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी परंपरा में सभी आचार्य श्री वीर सागर जी, श्री शिव सागर जी, श्री धर्मसागर जी, श्री अजीत सागर जी एवं हम स्वयं भी बाल ब्रह्मचारी है। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी की 36 दिवसीय संलेखना कुंथलगिरी महाराष्ट्र में हुई जोकि कुलभूषण ओर देश भूषण महामुनिराज की निर्वाण स्थली हैं।वह भी बाल ब्रह्मचारी थे ।इससे यही संदेश हैं कि ब्रह्मचर्य धर्म महान हैं। ब्रह्मचारी विषय भोग के बजाय आत्मा में रमण करते हैं। धर्म रूपी नदी सरोवर में विषय भोग रूपी वस्त्र उतार कर स्नान किया जाता हैं अब्रह्म विष जहर हैं जो मृत्यु देता हैं और ब्रह्म अमृत है जो जीवन देता हैं आत्मा की खोज धर्म से होती हैं।विषय कषाय से आत्मा को इन दश धर्मों से संत समागम से खोज कर सिद्ध आत्म स्वरूप को प्राप्त कर सकते है। प्राचीन आचार्य श्री जिनसेन स्वामी ने बचपन से कपड़े नहीं पहने। बह बालब्रह्मचारी रहे।इसी प्रकार सेठ सुदर्शन ओर सेठ जिनदत्त ओर जिंनदत्ता भी ब्रह्मचर्य व्रत पालन में प्रसिद्ध रहे है। आज चतुर्दशी पर आचार्य श्री सहित साधुओं और अनेक श्रावक श्राविकाओं ने उपवास किए। ब्रह्मचर्य धर्म पर यादगार अवसर आया कि नगर के युवा लोकेश जैन कलई ने दश लक्षण पर 10 उपवास की साधना की तथा आचार्य श्री से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार किया ।शाम को नगर के सभी मंदिरों में बड़ा अभिषेक हुआ।राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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