“उम्र से ज्ञान का कोई संबंध नहीं”—आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज ने सुनाया 9 साल के बच्चे का जीवन बदल देने वाला सवाल
श्मशान से लौटते समय बच्चे ने दादाजी से पूछा ऐसा सवाल, सुनकर हर कोई रह गया मौन—रिश्तों की अहमियत का दिया अनमोल संदेश
पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ।
व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज ने उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए जीवन की नश्वरता और रिश्तों की अहमियत से जुड़ा एक बेहद मार्मिक प्रसंग सुनाया। आचार्य श्री ने कहा कि ज्ञान केवल उम्र का मोहताज नहीं होता। कई बार एक मासूम बच्चा भी जीवन का ऐसा सत्य बता देता है, जिसे समझने में बड़े-बड़े लोगों को पूरी जिंदगी लग जाती है।
आचार्य श्री ने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि श्मशान से लौटते समय पूरे परिवार में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। कुछ देर पहले तक जिस घर में एक व्यक्ति मौजूद था, अब उसकी यादें ही शेष थीं। किसी के पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे। हर व्यक्ति अपने-अपने विचारों में डूबा हुआ था।
इसी खामोशी के बीच करीब 9 वर्ष का एक मासूम बच्चा अपने दादाजी का हाथ पकड़कर धीरे-धीरे चल रहा था।
अचानक बच्चे ने मासूमियत से पूछा—
“दादाजी… जो अंकल आज चले गए, क्या वे अपने साथ अपना घर, अपनी गाड़ी और अपने सारे रुपये-पैसे भी ले गए?”
दादाजी कुछ पल के लिए चुप हो गए। फिर बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए प्यार से बोले—
“नहीं बेटा… यह सब यहीं रह गया। इंसान अपने साथ केवल अपने कर्म और लोगों की दुआएं लेकर जाता है।”
दादाजी का जवाब सुनकर बच्चा कुछ देर तक शांत रहा। वह शायद उस बात को अपने मासूम मन में समझने की कोशिश कर रहा था। लेकिन कुछ ही क्षण बाद उसने ऐसा सवाल पूछ दिया, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति को भीतर तक झकझोर दिया।
बच्चे ने पूछा—
“अगर सब कुछ यहीं रह जाना है… तो लोग अपने ही लोगों से बात करना क्यों छोड़ देते हैं? छोटी-छोटी बातों पर लड़ते-झगड़ते क्यों हैं? अपनों से नाराज क्यों हो जाते हैं? अगर एक दिन सबको ऐसे ही चले जाना है, तो लोग एक-दूसरे को गले लगाकर क्यों नहीं जीते? प्रेम से क्यों नहीं रहते?”
मासूम बच्चे के इन सवालों का किसी के पास कोई जवाब नहीं था।
कुछ क्षण के लिए वहां मौजूद सभी लोग खामोश हो गए। किसी ने नजरें झुका लीं तो किसी की आंखें नम हो गईं। बच्चे की आवाज में मासूमियत थी, लेकिन उसके सवालों में पूरी जिंदगी का दर्शन छिपा था।
दादाजी ने बच्चे को अपने सीने से लगा लिया और कहा—
“बेटा, इंसान अक्सर यह भूल जाता है कि जिंदगी बहुत छोटी है। उसे लगता है कि माफी मांगने और रिश्ते सुधारने के लिए अभी बहुत समय है। वह सोचता है कि कल बात कर लेंगे, कल माफी मांग लेंगे, कल गले मिल लेंगे। लेकिन समय कभी किसी का इंतजार नहीं करता। कई बार जब समझ आता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।”
बच्चे ने तुरंत कहा—
“तो मैं बड़ा होकर कभी किसी अपने से नाराज होकर नहीं सोऊंगा। अगर मेरी गलती होगी तो माफी मांग लूंगा… क्योंकि मुझे किसी अपने को खोने के बाद पछताना नहीं है।”
आचार्य श्री ने कहा कि उस छोटे से बच्चे ने उस दिन वहां मौजूद हर बड़े इंसान को जीवन का ऐसा पाठ पढ़ाया, जिसे शायद कोई किताब भी इतनी सरलता से नहीं सिखा सकती।
बच्चे की बात ने बदल दी कई लोगों की सोच
श्मशान से लौटने के बाद कई लोगों ने अपने पुराने गिले-शिकवे भुलाकर अपनों से संपर्क किया। किसी ने भाई को फोन किया, किसी ने पिता से माफी मांगी तो किसी ने वर्षों बाद अपनी मां को गले लगाया।
उन्हें एहसास हुआ कि रिश्तों में जीत किसी को हराने में नहीं, बल्कि रिश्ते बचाने में है।
इंसान जीवनभर मकान, गाड़ी, धन-दौलत और प्रतिष्ठा जुटाने में लगा रहता है, लेकिन अंत में इनमें से कुछ भी उसके साथ नहीं जाता। पीछे रह जाती हैं उसकी यादें, उसके कर्म और लोगों के दिलों में उसके लिए निकली दुआएं।
रिश्तों को कल पर मत छोड़िए
आचार्य श्री के इस प्रसंग का संदेश बेहद सरल, लेकिन गहरा है—
जिंदगी बहुत छोटी है।
अपनों से प्रेम जताने में देर मत कीजिए।
गलती हो जाए तो माफी मांगने में संकोच मत कीजिए।
किसी अपने से नाराज हैं तो बात करने में देर मत कीजिए।
और जिनसे प्रेम करते हैं, उन्हें यह बताने के लिए किसी खास दिन का इंतजार मत कीजिए।
क्योंकि समय बीत जाने के बाद पछतावा तो रह जाता है, लेकिन लौटकर आया हुआ समय नहीं आता।
आचार्य श्री के इस मार्मिक संदेश में जीवन का सार छिपा है—
“धन-दौलत यहीं रह जाती है, इंसान के साथ उसके कर्म और लोगों की दुआएं ही जाती हैं। इसलिए बैर नहीं, प्रेम बांटिए; शिकायत नहीं, क्षमा रखिए और रिश्तों को टूटने से पहले संभाल लीजिए।”
प्रचार-प्रसार संयोजक: नरेंद्र अजमेरा, पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद
प्राप्त जानकारी एवं संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो.: 9929747312





