बच्चों को केवल संपत्ति नहीं, संस्कार और हुनर दें, ताकि वे जीवन में पीछे न रहें : सुधासागर महाराज
सच्ची विरासत धन-दौलत नहीं, आचार-विचार, आत्मविश्वास और स्वावलंबन है
भगवान के दास नहीं, आध्यात्मिक सहभागी बनें; नमोकार मंत्र से भय नहीं, विश्वास जगाएं
इंदौर।
बच्चों के भविष्य को लेकर आज हर माता-पिता चिंतित हैं, लेकिन उन्हें केवल संपत्ति देकर जाना ही पर्याप्त नहीं है। बच्चों को ऐसी विरासत दीजिए, जो जीवन की हर परिस्थिति में उनके साथ खड़ी रहे। उन्हें संस्कार, हुनर, निर्णय लेने की क्षमता, आत्मविश्वास और स्वावलंबन दीजिए। धन समाप्त हो सकता है और संपत्ति छिन सकती है, लेकिन अच्छे संस्कार और हुनर जीवनभर व्यक्ति को संभालते हैं।
यह प्रेरक संदेश राष्ट्रसंत, राजकीय अतिथि मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने इंदौर के दलाल बाग में आयोजित विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिया।
महाराज श्री ने कहा कि संतान को केवल संपत्ति देकर जाना सच्ची विरासत नहीं है। संपत्ति से पहले आचार और विचार की विरासत देना जरूरी है। बच्चों को जीवन जीने की कला सिखाइए, उन्हें परिस्थितियों से संघर्ष करना और अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाइए।

लोकोदय तीर्थ क्षेत्र कमेटी ने रखी अपनी बात
धर्मसभा के अवसर पर लोकोदय तीर्थ क्षेत्र कमेटी, आगरा के प्रतिनिधियों ने पूज्य गुरुदेव के समक्ष अपनी बात रखी। अध्यक्ष श्री निर्मल जैन मोठिया, महामंत्री एवं जिनवाणी चैनल के सीएमडी नीरज जैन, कोषाध्यक्ष श्री रूपेश जी सहित संस्था के प्रतिनिधियों ने श्रीफल अर्पित कर पूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद प्राप्त किया।
इस दौरान संस्था प्रतिनिधियों ने लोकोदय तीर्थ के निर्माण को लेकर अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। नीरज जैन ने कहा कि संस्था तीर्थ निर्माण के संकल्प को लेकर पूरी तरह संकल्पबद्ध है।

अहमदाबाद से पधारे श्री विनय एवं श्रीमती आभा जैन, प्रमुख उद्योगपति श्री नवीन कुमार एवं श्रीमती अलका, दिगंबर जैन समाज बड़ौदिया-बागड़िया से श्री मनीष जैन एवं श्री पवित्र जैन, अमेरिका से पधारे श्री अशोक सेठी सहित अन्य अतिथियों का स्वागत चक्रवर्ती अध्यक्ष श्री नवीन गोधा, सामाजिक संसद अध्यक्ष श्री आनंद गोधा एवं महोत्सव अध्यक्ष श्री अशोक डोशी द्वारा किया गया।
भगवान के दास नहीं, आध्यात्मिक सहभागी बनें
महाराज श्री ने कहा कि भगवान को अपना नाथ मानना चाहिए, लेकिन स्वयं को केवल दास समझकर निष्क्रिय बैठ जाना उचित नहीं है। भगवान ने जिस पूर्णता को प्राप्त किया है, उसी दिशा में हमें भी पुरुषार्थ करना है।
उन्होंने कहा कि केवल भक्ताम्बर, समयसार या अन्य शास्त्र पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है। आचार्यों के ज्ञान को पढ़ने के बाद उसे अपनी बुद्धि, चिंतन और अनुभव के माध्यम से अपना ज्ञान बनाना आवश्यक है।
ज्ञान होना और ज्ञानी होना अलग-अलग बातें हैं। केवल भगवान का नाम लेना भक्ति नहीं है। भगवान के विचारों को अपने विचार और उनके गुणों को अपने जीवन का लक्ष्य बनाना ही सच्ची भक्ति है।
नमोकार मंत्र से भय नहीं, विश्वास जगाएं
नमोकार मंत्र की महिमा बताते हुए महाराज श्री ने कहा कि मंत्र केवल भय के समय पढ़ने की वस्तु नहीं है। मंत्र के प्रति ऐसा विश्वास होना चाहिए, जो व्यक्ति के भीतर निर्भयता पैदा करे।
व्यक्ति के भीतर यह भाव जागना चाहिए—
“मैं अनाथ नहीं हूं। मेरा नाथ है, मेरा गुरु है, मेरा धर्म है, मेरे पास नमोकार मंत्र है और मेरे भीतर आत्मशक्ति है।”
यही विश्वास विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है।
शरीर को चोट लग सकती है, आत्मा को नहीं
महाराज श्री ने आत्मा और शरीर के भेद को समझाते हुए कहा कि शरीर को चोट लग सकती है, लेकिन आत्मा का वास्तविक स्वरूप उससे परे है।
“जिसे तलवार काटती है, वह मैं नहीं हूं; जो मैं हूं, उसे तलवार काट नहीं सकती।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी शारीरिक पीड़ा को नकारने की बात नहीं, बल्कि आत्मा को शरीर से भिन्न जानने की उच्च आध्यात्मिक साधना है। इसी प्रकार किसी की गाली, निंदा या आलोचना से अपने भीतर की शांति को नष्ट नहीं होने देना चाहिए।
“उसका मुँह है, लेकिन कान तुम्हारे हैं”
महाराज श्री ने कहा कि दूसरा व्यक्ति क्या बोलता है, यह हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होता, लेकिन हम उसकी बातों को अपने मन में कितना स्थान देते हैं, यह हमारे हाथ में है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आत्ममंथन का आह्वान करते हुए कहा—
“मेरे जीवन को देखकर कौन व्यक्ति धर्म की ओर प्रभावित हुआ? मेरी पूजा देखकर किसका मन पूजा करने को ललचा? मेरे त्याग को देखकर किसके मन में त्याग का भाव आया? मेरे व्यवहार से किस व्यक्ति को निर्भयता और सहारा मिला?”
यदि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता है तो यही हमारी अगली साधना होनी चाहिए।
स्वयं धन्य होने से आगे बढ़ें, किसी और का जीवन धन्य बनाएं
महाराज श्री ने कहा कि केवल स्वयं धन्य होने की भावना तक सीमित न रहें, बल्कि किसी दूसरे के जीवन को धन्य बनाने का प्रयास करें। स्वयं निर्भय होने के साथ किसी दूसरे को निर्भय बनाएं। स्वयं भगवान से प्रभावित होने के साथ अपने जीवन से किसी दूसरे को प्रभावित करें।
जीवन ऐसा बनाइए कि आपको देखकर किसी दूसरे के मन में भी यह भाव जागे—
“काश! मेरा जीवन भी ऐसा होता।”
धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी का श्रवण कर आध्यात्मिक लाभ लिया। पूरे परिसर में धर्ममय वातावरण बना रहा और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
अखिल भारतीय श्रावक संस्कार शिविर में देशभर से प्रतिनिधि होंगे शामिल
इसी क्रम में आयोजित होने वाले अखिल भारतीय श्रावक संस्कार शिविर में देशभर से प्रतिनिधियों के भाग लेने की जानकारी भी दी गई। शिविर के माध्यम से श्रावकों में संस्कार, धर्म, आत्मचिंतन और जीवन मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312






