“गुरु का सम्मान नोबल पुरस्कार से कम नहीं” — प्रसन्न सागर जी

धर्म

 

 

“गुरु का सम्मान नोबल पुरस्कार से कम नहीं” — प्रसन्न सागर जी

 

पुष्पगिरी में शिक्षक सम्मान समारोह: पुष्पदंत सागर जी ने अपने गुरु एसके माथुर को किया नमन, बोले— शिक्षा में करुणा, स्नेह और संस्कार होंगे तो जन्मेंगे राम, कृष्ण और महावीर जैसे महापुरुष

 

पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ।

शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि विद्यार्थी के जीवन को सही दिशा देने वाला मार्गदर्शक होता है। शिक्षा में यदि करुणा, स्नेह और उपयोगी संस्कार जुड़ जाएं तो समाज में राम, कृष्ण और महावीर जैसे महापुरुषों का जन्म हो सकता है। यह भावपूर्ण संदेश पुष्पगिरी तीर्थ पर संतों के सानिध्य में आयोजित शिक्षक सम्मान समारोह में गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज ने दिया।

 

अंतर्मना धार्मिक एवं पारमार्थिक ट्रस्ट के तत्वावधान में आयोजित समारोह में देशभर से आए शिक्षकों का सम्मान किया गया। समारोह का सबसे भावुक और प्रेरणादायी क्षण उस समय आया, जब गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज ने अपने सांसारिक जीवन के गुरु एसके माथुर को सम्मानित किया।

“माथुर साहब मेरे शिक्षक नहीं, मेरे भगवान थे”

 

अपने गुरु को याद करते हुए गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज ने कहा कि कॉलेज के समय उनके पास पैसे नहीं थे। उस समय उनके गुरु एसके माथुर साहब ने पोस्ट ऑफिस में उनका खाता खुलवाया और उसमें कुछ पैसे जमा कराते हुए कहा था कि पढ़ाई में जब भी जरूरत पड़े, वहां से पैसे निकाल लेना।

 

उन्होंने भावुक होते हुए कहा— “माथुर साहब मेरे टीचर नहीं, मेरे भगवान थे।” वर्षों बाद अपने गुरु को सामने देखकर उन्होंने इसे अपने जीवन का सौभाग्य बताया।

 

उन्होंने कहा कि मां भारती का सम्मान होना चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति के भीतर राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत होनी चाहिए। उन्होंने नित्य वंदेमातरम् गान की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

 

“विद्या के मंदिर में संस्कार लेकर जाएं शिक्षक”

 

आज की शिक्षा व्यवस्था पर चिंतन करते हुए गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज ने कहा कि शिक्षक यदि शिक्षा के मंदिर में केवल आधुनिक वेशभूषा के साथ जाने के बजाय बच्चों के भीतर करुणा, स्नेह और संस्कार विकसित करने का प्रयास करें तो समाज की दिशा बदल सकती है।

 

उन्होंने कहा कि शिक्षक का दायित्व केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि विद्यार्थी के चरित्र का निर्माण करना भी है। जब शिक्षा के साथ संस्कार जुड़ेंगे, तब समाज में राम, कृष्ण और महावीर जैसे महापुरुषों के आदर्श दिखाई देंगे।

 

“मेरी जेब में आज भी शिष्य की तस्वीर रहती है”

 

समारोह में गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज के सांसारिक जीवन के गुरु एवं मुख्य वक्ता एसके माथुर ने पुराने संस्मरण साझा किए। उन्होंने बताया कि वे 16 वर्ष की उम्र में सुशील जी के संपर्क में आए थे। उन्होंने गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज को मेधावी विद्यार्थी बताते हुए कहा कि उन्होंने एक बार में डिप्टी कलेक्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की थी।

 

उन्होंने कहा कि उनके सांसारिक शिष्य, जो आज गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज हैं, उनकी तस्वीर वे आज भी अपनी जेब में रखते हैं। उन्होंने बताया कि प्रसन्न सागर जी महाराज को भी उन्होंने बचपन में गोद में खिलाया था। दोनों को एक साथ देखकर उनका मन आनंद से भर गया।

 

उन्होंने कहा कि सांसारिक जीवन में उन्होंने अपने शिष्य को सत्य बोलने और हमेशा धैर्य रखने की शिक्षा दी थी। साथ ही उपस्थित शिक्षकों और विद्यार्थियों से सभी के प्रति आदर तथा परिवार के प्रति अच्छा व्यवहार करने का आह्वान किया।

 

“एआई जानकारी दे सकता है, संस्कार नहीं”

 

सौम्य मूर्ति मुनि पीयूषसागर जी महाराज ने वर्तमान समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव के बीच शिक्षक की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा—

 

“एआई जानकारी दे सकता है, संस्कार नहीं। वह अहिंसा और संस्कार का मार्ग नहीं दिखा सकता। एआई सर्च है तो शिक्षक स्पर्श है।”

 

उन्होंने कहा कि तकनीक ज्ञान तक पहुंच आसान बना सकती है, लेकिन विद्यार्थी के व्यक्तित्व निर्माण में शिक्षक का स्नेह, मार्गदर्शन और संस्कार महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 

“एक साल की सोच है तो बीज बोइए, सौ साल की सोच है तो शिक्षक बनिए”

 

पट्टाचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज ने शिक्षक की भूमिका को बताते हुए कहा कि जीवन को सही मार्ग पर लाने वाला ही सच्चा शिक्षक है।

 

उन्होंने प्रेरक उदाहरण देते हुए कहा कि जो विद्यार्थी को समुद्र में फेंक दे, फिर उसे वहां से निकालकर पहाड़ पर बैठा दे और अंततः अनंत आकाश में उड़ने के लिए प्रेरित कर दे— वही सच्चा शिक्षक है।

 

उन्होंने कहा—

 

“एक साल की सोच हो तो बीज बोइए, दस साल की सोच हो तो पेड़ लगाइए और सौ साल की सोच हो तो शिक्षक बन जाइए।”

 

अपने गुरु के सम्मान के अवसर पर उन्होंने कहा कि एक विद्यार्थी द्वारा जीवन के इस पड़ाव पर आकर अपने गुरु का सम्मान करना अत्यंत भावुक और गौरवपूर्ण दृश्य है। यह सम्मान किसी नोबल पुरस्कार से कम नहीं है।

 

उन्होंने शिक्षकों से कहा कि संतों का समागम पुण्य से मिलता है और कामना है कि दुनिया के सभी शिक्षकों का पुण्य भी ऐसा ही हो। उन्होंने शिक्षकों को संदेश दिया कि जीवन में किसी उपकारी के उपकार को कभी नहीं भूलना चाहिए।

शिक्षकों का हुआ सम्मान

 

समारोह का शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। मंगलाचरण मुनि नेगम सागर जी महाराज एवं दिशी जैन ने किया।

 

गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज के गुरु एसके माथुर का पुष्पमाला, शॉल, स्मृति चिह्न एवं प्रशस्ति-पत्र भेंट कर सम्मान किया गया। प्रशस्ति-पत्र का वाचन पट्टाचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज ने किया।

 

इस अवसर पर मा. योगेश शर्मा, संगठन मंत्री, विष्णु जी आर्य वरिष्ठ व्याख्याता, सतीश चंद तिवारी वरिष्ठ शिक्षक, प्रतिभा शर्मा शिक्षाविद, राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त सुनीता गोधा सहित अन्य शिक्षकों का सम्मान किया गया। स्वागताध्यक्ष विधायक डॉ. राजेश सोनकर, पुष्पगिरी सचिव सुभाष जैन, ट्रस्टी अशोक दोषी, आकाश जैन सहित अन्य अतिथियों ने सम्मान किया।

 

समारोह में उपस्थित सभी शिक्षकों का ट्रस्ट समिति की ओर से तिलक कर दुपट्टा पहनाकर अभिनंदन किया गया तथा स्मृति स्वरूप बैग, कलम और मिठाई भेंट की गई।

 

विधायक ने शिक्षकों को किया नमन

 

विधायक डॉ. राजेश सोनकर ने कहा कि संतों की साधना समाज के लिए प्रेरणा है। उन्होंने मंच से उपस्थित सभी शिक्षकों को प्रणाम करते हुए कहा कि शिक्षक समाज निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 

उन्होंने उन शासकीय शिक्षकों का भी सम्मान किया, जिन्होंने अपनी मांगों के चलते इस बार शिक्षक सम्मान ग्रहण नहीं करने का निर्णय लिया है।

 

समारोह का संचालन सौम्य मूर्ति मुनि पीयूषसागर जी महाराज ने किया, जबकि आभार जिनवाणी स्कूल के शिक्षक अतुल सर ने व्यक्त किया। आयोजन के समापन के बाद उपस्थित सभी शिक्षकों एवं श्रद्धालुओं ने भोजन प्रसाद ग्रहण किया।

 

प्रचार-प्रसार संयोजक: रोमिल पाटणी, सोनकच्छ; नरेंद्र अजमेरा एवं पियुष कासलीवाल, औरंगाबाद।

जानकारी संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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