अपने घर को स्वर्ग बनाने या नरक बनाने की जिम्मेदारी एक माँ की हुआ करती सुप्रभ साग़र जी
विदिशा
एक स्त्री एक मां का स्थान श्रेष्ठ हुआ करता है।अपने घर को स्वर्ग बनाने या नरक बनाने की जिम्मेदारी एक माँ की हुआ करती है। सशक्तिकरण का अर्थ यह नहीं कि स्त्री और पुरुष की आपस में प्रतिस्पर्धा हो सशक्तिकरण का अर्थ है कि पहले प्रत्येक मां को संस्कारित होकर अपने परिवार और अपनी समाज को प्रबधन करना होगा। कौशल्या और त्रिशला बने। इसके बिना आप राम और महावीर को जन्म नहीं दे सकती।
यह उदगार मुनि श्री सुप्रभ सागर जी महाराज ने श्री वासूपूज्य जिनालय इन्द्रप्रस्थ कालोनी में “महिला सशक्तिकरण”आत्मनिर्भरता, “जॉब करें या न करें”बालप्रबधन एवं परिवार प्रबधन पर चर्चा करते हुये व्यक्त किये।
एक मां को सबसे पहले अपने घर परिवार के मेनेजमेंट को समझना होगा।
मुनि श्री ने कहा कि एक मां को सबसे पहले अपने घर परिवार के मेनेजमेंट को समझना होगा। तभी वह राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर समय दे सकती है। मुनि श्री ने कहा क्रिटीसाईज, कम्पलेंट और कम्पेरीजन करना छोड़ दोगे तो आप जीवन शिल्पी बन जाओगी।एक बेटी एक बहु को सबसे पहले अपने घरों को संभालने की आवश्यकता है।

मुनि श्री ने उदाहरण देते हुये कहा कि एक अबला, एक स्त्री,एक महिला घर की देहरी पर रखा हुआ दीपक के समान है। वह दीपक घर के अंदर भी प्रकाश करता है, और घर के बाहर भी प्रकाश करता है। उसी प्रकार एक मां एक महिला एक बेटी ही अपने घर को स्वर्ग ब ना देती हे। मुनि श्री ने कहा कि महिलासशक्तिकरण के सही मायने कोई नहीं जानता?

उसका सही अर्थ हे महिला और पुरुष दौनों को एक दूसरे को समझना। मुनि श्री ने कहा कि शारीरिक रूप से अपने आपको सशक्त करने की जरूरत नहीं। बल्कि अपने आप को मानसिक रुप से बदलने की आवश्यकता है।
आज सभी लोग मात्र मनी की ओर भाग रहे है,
मुनि श्री ने कहा आज सभी लोग मात्र मनी की ओर भाग रहे है, पारिवारिक मेंनेजमेंट को भूल चुके है। इससे अंदर की मिठास समाप्त हो चुकी है। मुनि श्री ने कहा कि एक स्त्री को बहुआयामी बनना चाहिये था वहीं आकृमिक हो गयी है।मुनि श्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति में माँ को श्रेष्ठ दर्जा दिया गया है। एक गुरु से पहले माँ को दिया गया है।पहले एक माँ आठ से दस संतान को संभालती थी आज हम दो हमारे दो का भी मेनेजमेंट नही हो पा रहा। मुनि श्री ने कहा कि माँ बनना सहज है, लेकिन आज लक्ष्मीबाई तो छोड़ो आज द्रोपदी भी नहीं बची। उस द्रोपदी ने कहा था कि में एक माँ हूं मेंने अपनी संतान को खोया है। मां का दुःख क्या होता है में जानती हुं। में दूसरों की संतान का दुःख नहीं देख सकती।।
मुनि श्री ने कहा एक माँ वह थी, एक मां आजकल की है। जो परिवार नियोजन के चक्कर में अपने बेटे को जन्म लेने से पहले ही टुकड़े कर देती है। मुनि श्री ने कहा कि कार्य की सिद्धी तभी होती है, जब आप उस कार्य को मन वचन और काय से “भावों की विशुद्धि के साथ करें। यदि आपका मन पवित्र नहीं है,तो आप कितनी ही बार बार सौधर्म इन्द्र बनकर दिन रात भगवान की पूजा और विधान कर लेना, चारित्र गृहण कर लेना, खूब दान करना, शुभ मुहूर्त भी निकाल लेना, लेकिन यदि आपने हृदय में आत्म चिंतन नहीं किया तो आपकी पूजा विधान,और आपका संपूर्ण ज्ञान, आपका चारित्र, आपकी तपस्या बेकार हो जाएगी”
मुनि श्री ने कहा कि हम पुण्य की क्रिया तो करते है लेकिन उन क्रिआओं को करते समय जिन भावों की आवश्यकता है उन भावों तक नहीं पहुंच पाते।इसलिये जो फल हमें मिलना चाहिये वह फल हमें नहीं मिलता क्या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के लिये पिता दशरथजी ने तथा राजपुरोहित वशिष्ठ महाराज ने शुभ मुहूर्त नहीं निकाला था?
शुभ मुहूर्त भी निकाला राजपरिवार और नगरवासी भी चाहते थे,दृव्य क्षेत्र काल की गणना भी की गयी थी, लकिन कही न कही परिणामों में विशुद्धि नहीं थी। और उन परिणामों की विशुद्धि के कारण ही एक मात्र कैकई मां की स्वीकृति नही होंने से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को गद्दी न मिल सकी। जहा पर श्री राम का राजतिलक होंना था वही उनको राज्य छोड़कर जंगल की ओर जाना पड़ा। दूसरी ओर रावण की पूजा और भक्ती में कही कमी नहीं थी वह प्रकांड विद्वान था लेकिन कही न कही चारित्र और भावों की कमी थी उस कारण उसे भगवान की भक्ती का फल नहीं मिला। मुनि श्री ने कहा कि भले ही एक पूजा कम करना लेकिन भावों से करना। भावों की विशुद्धि नहीं है तो आपकी दिन भर की पूजा से पुण्य का फल और लाभ मिलने वाला नहीं है। उपरोक्त जानकारी देते हुये श्री शीतल विहार न्यास शीतलधाम के प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि इस अवसर पर नगर की सभी महिलामंडलों ने मुनिसंघ को श्रीफल अर्पित किये।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
