वर्तमान में महावीर स्वामी के सिद्धांतो की प्रांसंगिता डॉक्टर अरिहंत जैन की कलम से
:आज से 2550 वर्ष पूर्व जहाँ भारत धार्मिक आडंबर और सत्ता हेतु समय समय पर होने वाले युद्धों से त्रसित था, वहीं विश्व की अधिकतर अन्य सभ्यताएँ तो अज्ञान के अंधकार में शुप्त थी । मानवता क़राहरही थी । मूक पशुओं की बलि को पुण्य का नाम देकर तथाकथित धर्म के साहूकार भोली जनता को दिग्भ्रमितकर रहे थे। तार्किक दृष्टिकोण और ज्ञान के प्रति रुझान समाप्त सा हो गया था। किंतु संत प्रसविनी भारत भूकी वैशाली नगरी में माँ त्रिशला के गर्भ से आविर्भाव हुआ तीर्थंकर महावीर का ।“प्राची दिशा के अंक में, नूतन – दिवाकर आ गया, भविजन जलज विकसित हुए, जग में उजाला छा गया”और 2550 वर्ष पूर्व इस विभूति के द्वारा बताए सम्यक् – दर्शन -ज्ञान- चरित्र रूपी समीचीन धर्म सिद्धांत सेवर्तमान विश्व की अधिकांश समस्याओं का उन्मूलन किया जा सकता है। निम्नलिखित साक्ष्यों से हम यहसमझने का प्रयास करते हैं की किस प्रकार ये सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक है जितने की २.५ सहस्त्राब्दी
पूर्व थे।आतंकवाद और विश्व युद्ध का “अहिंसा परमो धर्म” ही समाधान : साम्राज्यवाद, कहरवाद एवं आतंकवादकी समस्या आज वैश्विक समस्या बन चुकी है। इतिहास साक्षी है यह मानवता युग-युगांतर से धर्म के नामपर युद्ध करती आयी है। फ़िलिस्तीन में सदा से यहूदी तथा मुसलमान वर्गों में धर्म के नाम पर युद्ध होता आयाहै। वर्तमान में चल रहे इज्रेल के युद्ध की विभीषिका इसी का ज्वलंत उदाहरण है। किंतु एक दार्शनिक ऐसा हुआजिसने अहिंसा को ही परम धर्म बता दिया। यदि मानवता और इसके रखवाले इस सिद्धांत को हृदयंगम करलेते तो विश्व युद्ध की विभीषिकाएँ मानवता को नहीं झेलनी पड़ती।
इन्ही विश्व युद्ध की त्रासदियों के परिणामस्वरूप विश्व शांति को बनाए रखने हेतु संयुक्त राष्ट्र का गठन हुआ। 15 जून 2007 को संयुक्त राष्ट्र संगठन ने2अक्टूबर-गांधी जयंती को “अंतर – राष्ट्रीय अहिंसा दिवस” के रूप में मनाने का प्रस्ताव पारित किया । वर्तमान विश्व को अहिंसा का पथ दिखलाने वाले महात्मा गांधी स्वयं तत्कालीन जैन आचार्य श्रीमद् राजचंद्रऔर वीरचंद गांधी को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे। (2) अहिंसा के सिद्धांत को जितनी वृहदता से भगवानमहावीर ने स्वयं जिया और अपने अनुयायियों में प्रतिपादित किया, वैसा अन्य कोई ना ही कर पाया औरसंभवत: इस अवसर्पिणी काल में ना कोई कर पाएगा।
“जंग एक भी नहीं लडी फिर भी जग को जीत लिया.
अहिंसा के सिद्धांत से जन जन को कृतकृत्य किया”अत : यह कहने में रंच मात्र भी अतिशयोक्ति नहीं की बारूद, जैविक और

परमाणु हथियारों के ढेर पर बैठी इसमानवता को यदि कोई दर्शन सुरक्षा कवच प्रदान कर सकता है तो वह मात्र अहिंसा का सिद्धांत है। यदि सभीराष्ट्र अपने संकीर्ण हितो को त्याग कर “जीयो और जीने दो’ का सिद्धांत अपनायें तो महयुद्धो की विभीषिका से बचा जा सकता है। एक राष्ट्र द्वारा दूसरे पर आक्रमण होने पर जन धन की अपार हानि होती है एवं हिंसा केतांडव से मानवता कराह उठती है। एसे में महावीर की अहिंसा को अपनाना ही एक मात्र रास्ता है।जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण क्षरण और “परस्परोग्रहो
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जीवानाम” तथा “अपरिग्रह, उत्तम शौच, उत्तमसंयम ” सिद्धांत से समाधान : पश्चिमी सभ्यताओं में भौतिक सुख सम्पदा को ही विकास का पर्यायवाचीमाना गया। परिणाम स्वरूप पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर तथाकथित आधुनिकता की दौड़ में सभीराष्ट्रों ने पर्यावरण का, वन एवं वनस्पति सम्पदा का अंधा-धुन दोहन किया है। काटे जा रहे पहाड़, वृक्षऔर बनते जा रहे काँक्रीट के जंगल। जल संसाधनो का दुरुपयोग । चारों और फैली भौतिकता । वायु, जलऔर मिट्टी की गुणवत्ता जैसे संसाधनों की कमी, पारिस्थिति तंत्र का विनाश, आवास विनाश, वन्यजीवों काविलुप्त होना और प्रदूषण के माध्यम से पर्यावरण की गिरावट वर्तमान और भविष्य के लिए गम्भीर समस्याए

है।
पर्यावरणीय क्षरण संयुक्त राष्ट्र के खतरों, चुनौतियों और परिवर्तन पर उच्च स्तरीय पैनल द्वाराआधिकारिक तौर पर चेतावनी दिए गए दस खतरों में से एक है। (3) पर्यावरणीय क्षरण से सम्बंधित विभिन्नसमस्याओं की उपज मानव की कभी ना पूर्ण होने वाली इन्द्रिय सुख की लालसा है। आज विज्ञान भी जल,वायु, तथा वनस्पति में जीव मानता है। किंतु वीर की जैन शैली में वनस्पति को वनस्पतिकायक जीव, वायु मेंवायुकायिक, भूमि में पृथवीकायिक, जल मेंजलकायक जीव मान कर इनके दोहन को जीव हिंसा कहा औरइसे त्याज्य बताया। आज भी घर घर में वीर के अनुयायी नित प्रतिदिन अपने द्वारा जल पवन इत्यादि कोपहुँचायी गयी हानि के लिए नित प्रति निम्न पंक्तियों द्वारा आलोचना करते है और इन्हें त्यागने का प्रयास करते है।
“ पुनि बिन गालयो जल ढोलयो, पंखा ते पवन बिलोल्यो, नदियाँ बिच चीर धुवाए, कोसन के जीव मराए”
स्थावर और जंगम सभी जीवों के अस्तित्वों को स्वीकारने वाला ही पर्यावरण और मानव जाति को प्रलय कीऔर अग्रसर होने से बचा सकता है। वीर – जिन मुखोद्भव वाणी से रचित संस्कृत के प्रथम ग्रंथ तत्वार्थ सूत्र के पाँचवे अध्याय के 21श्लोक में परस्परोग्रहो: जीवानाम का कथन किया गया; यह सिद्धांत परस्पर द्रव्यों औरजीवों के एक दूसरे पर उपकार का संदेश देता है। इसी प्रकार उत्तम शौच और इन्द्रिय व प्राणी संयम का कथनतत्वार्थ सूत्र के 9अध्याय में 10 धर्मों के अंतर्गत किया गया। ये दोनो ही धर्म हमें क्षणिक सुखों में अत्यधिकलिप्त होने से बचने की प्रेरणा देते है। आवश्यकता से अधिक उपभोक्तावाद, अधिक से अधिक पा लेने कीलालसा में आज की पीढी विक्षिप्त सी हो चली है। अपरिग्रह अणु व्रत और भोग उपभोग परिमाण व्रत को
तो सम्यक् चरित्र के बुनियादी सोपान : व्रत प्रतिमा का आवश्यक अंग बताया गया है। यदि इन व्रतों के आवलंबन से मानव अपनी बाह्य सुख सुविधा की निरन्तर बढ़ती हुई कामनाओं को सीमित कर ले, तो पर्यावरणक्षरण जैसी समस्याओं से सुलभता से निपटा जा सकता है तथा सतत विकास में पर्यावरण संरक्षण के सामवेशन को गर्भित किया जा सकता है।
बढ़ता कर्क रोग का शाकाहार, सप्त व्यसन त्याग और रात्रि भोजन त्याग से समाधान:
आज कर्क रोग विश्वके आम रोगों में से एक है तथा इसके आँकड़े निरन्तर वृद्धी को प्राप्त हो रहे है। हाल ही में Watson तथासहयोगियों द्वारा 472,377 के स्वस्थ लोगों में 11 वर्षों तक की गयी शोध के परिणाम बताते हैं कि शाकाहारीव्यक्तियों में आंत (colon), गदूद (prostate) और स्तन (ब्रेस्ट) कैन्सर का ख़तरा माँसाहारी व्यक्तियों से कईगुना कम था। यह शोध दर्शाते है की शाकाहारी जीवन शैली पर्यावरण एवं गुणात्मक जीवन के लिए उपयोगीहै। कृषि में कीटनाशक का प्रयोग, और धूम्रपान तथा मदिरा पान का भी सीधा सम्बंध कर्क रोग से है।जैनदर्शन छोटी से छोटी जीव हिंसा को भी स्वीकार नहीं करता तथा कीटनाशकों के प्रयोग को सर्वथा अनुचित
मानता है।भगवान महावीर ने सप्त व्यसन त्याग और मधु माँस मदिरा का त्याग श्रावक के मूल गुणो में गर्भितकिया। इसका उल्लेख आज से 2000 वर्ष पूर्व लिखे गए समंतभद्र आचार्य द्वारा रचित रत्न करंड श्रावकाचारग्रंथ में है। इसी प्रकार रात्रि भोजन त्याग और “इंटर्मिटेंट फास्टिंग” के सिद्धांत से भी स्तन कर्क रोग में कमीदेखी गयी। यही कारण है की सब यह स्वीकारने लगे है की महावीर के अनुयायी ज़्यादा स्वस्थ एवं दीर्घायुप्राप्त कर रहे है। उनका प्रसन्नता और सेहत सूचकांक किसी और समाज एवं धर्मवलंबियो से कही अधिक अच्छा है।

परिवारिक और व्यक्तिगत तनाव, नैतिक पतन और “उत्तम क्षमा”, “उत्तम ब्रह्मचर्य” व कर्म सिद्धांत से उसका समाधान :
आज का मानव विभिन्न प्रकार की सामाजिक असमानताओ से जूझ रहा है। लैंगिक असमानता एवंघरेलु हिंसा की घटनाओं से नारी जाति को प्रताड़ित किया जाता है, विधवाओ एवं बुज़ुर्गों कोअपमानित कियाजाता है। दहेज, तलाक़, बलात्कार, आत्महत्याओं की घटनाओं के समाचार प्रतिदिन की सुर्ख़ियाँ होती है। संयुक्त परिवार टूट रहे है। बुज़ुर्गों के सम्मान का ह्रास हो रहा है। यदि उत्तम क्षमा धर्म के सिद्धांत का पालननिष्ठा से किया जाए तो अधिकतर पारिवारिक व सामाजिक मतभेदों से अत्यंत सरलता से निपटा जा सकताहै। युवाओं में मर्यादाओं का खंडन हो रहा है ओर सीमाये लाँघना फ़ेशन हो रहा है। कमोवेश सर्व समाज विवाहवरसंबंधो एवं तलाक़ जैसी समस्याओं से ग्रसित है। यदि आज के युवा अपने शील धर्म और स्वदार संतोष व्रत
का पालन करे, उत्तम ब्रह्मचर्य अणु व्रत का पालन करे तो समाज विसंगतियों से बच सकता है। महावीर केअनुयायी कर्म सिद्धांत में विश्वास करते है जिसके अनुसार हम स्वयं अपने भाग्य विधाता है। हम हमारे अच्छेएवं बुरे कर्मों का फल भोगना ही पढ़ता है। जीव अपने ही पूर्वोपार्जित कर्मों का फल भोगता है, उसके सुख दुःखका कारण वह स्वयं है। इस प्रकार की आत्मोन्मुखी सोच हमें ग़लत, अपराधिक एवं अनुचित कृत्यों से बचाती है ।सामाजिक तनाव और “अनेकांतवाद” व “सर्वोदय” के सिद्धांतो से उसका समाधान: अपनी बातको सही और दूसरों की बात को गलत मानने के कारण ही समस्याएं उत्पन्न होती हैं। लेकिन महावीर स्वामी काअनेकांत दर्शन हमें किसी भी समस्या पर खुले नजरिये से सोचने की दृष्टि देता है । अनेकांत की दार्शनिक
परिभाषा है- ‘एक ही वस्तु में परस्पर विरुद्ध प्रतीत होने वाली शक्तियों का एक साथ प्रकाशित होना ही अनेकांतकहलाता है।’ बाद में अनेकांत की दार्शनिक परिभाषा ने व्यवहार के धरातल पर कदम रखा। संतों, महात्माओंने इसकी व्यावहारिक व्याख्याएं कीं और इसे आम लोगों की सामाजिक तथा राष्ट्रीय समस्याओं के समाधानमें उपयोगी बताया। अनेकांत सिद्धांत के अनुसार, हमारा दृष्टिकोण भी सत्य हो सकता है तथा अन्य दृष्टिकोणभी सत्य हो सकते हैं। यही अनेकांतपरक चिंतन कहलाता है, जो विद्रोहों, झगड़ों और समस्याओं से हमें मुक्तरख सकता है। अलगाववादी प्रवृत्तियों के कारण हर कोई स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है। लेकिन जैन
साहित्य में अनेकांत की अवधारणा अत्यंत उदारवादी है, जिससे इन सभी समस्याओं से मुक्ति मिल सकतीहै। सर्वोदय शब्द का प्रयोग सबसे पहले महावीर ने ही किया था। यह शब्द और विचार गांधी जी और विनोबाजी जैसे चिंतकों को बहुत प्रिय लगा। ‘सर्वोदय’ का अर्थ है सभी का विकास। हर वर्ग, हर जीव के उदय कीबात अनेकांत का विकासवादी सिद्धांत ही कर सकता है। समाज के किसी भी वर्ग की उपेक्षा तो अनेकांतकी दृष्टि से वह छद्म विकास होगा। विकास के अर्थो में हम अनेकांत दर्शन को सर्वोदय दर्शन के रूप में ग्रहणकर सकते हैं, जहां संस्कृति औरपरंपरा को अनुपयोगी बताकर उसका अवमूल्यन नहीं किया जाता, बल्कि उसेमानव जीवन, परिवार-समाज में प्राण- चेतना भरने के लिए नितांत आवश्यक माना जाता है।
: उपरोक्त सभी तो कुछ ही उदाहरण हैं। वर्तमान शिक्षा नीति में सम्यक् ज्ञान के सिद्धांत का
समन्वय, 12 भावना के सिद्धांतो से बड़ते मानसिक तनाव और समबंधित रोगों से मुक्ति, समाधि मरण केसिद्धांतो से अपरिहार्य रोगों से समता पूर्वक़ देह त्याग की प्रणाली, १६ करण भावनाओं से विश्व कल्याणकी भावना और सम्यक् चरित्र के सिद्धांत से पुरुषार्थ और स्वावलम्बन से एक नीतिपूर्ण और ख़ुश हाल जीनेकी कला आदि : जीवन के हर पेहलु पर वीर की वाणी हमें सही मार्ग दिखाने में सक्षम है। । प्रश्न उठता है कीमहावीर की इस धरोहर को परिवार, समाज, देश एवं विश्व के कल्याण के लिए किस प्रकार प्रचारित एवंकार्यरूप में परिणित किया जाए। मुनि तरुण सागरजी के अनुसार इसके लिए महावीर को मंदिरो की क़ैद सेआज़ाद कर चोराहे पर लाना होगा। जन साधारण को यह समझना होगा कि जैन धर्म जीवन में उतारना कठिननहीं है। वीर की वाणी मात्र संयम एवं आत्म नियंत्रण का पाठ नहि, बल्कि उससे कही अधिक विस्तृत है। यह
केवल जैन जाति का धर्म नहीं है परंतु एक जीवन दर्शन है, नैतिकता एवं समन्यवाद का पाठ है। भागीरथ आतेहैं, जगत को मोड़ देते है, गति देते है, शक्ति देते है और चले जाते है। जीवन की अनवरत अविरल धारा चलतीरहती है। महावीर का दर्शन भी हमारे लिए एक पाथेय है, ध्येय है, कीर्तिस्तम्भ है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
