वाणी अर्श से फर्श पर ला सकती है, इसलिए शब्दों के प्रति हमेशा सजग रहें : स्वस्तिभूषण माताजी
केशवरायपाटन।
मनुष्य की पहचान केवल उसके कर्मों से नहीं, बल्कि उसकी वाणी और शब्दों से भी होती है। हमारी कही हुई एक बात किसी के हृदय को प्रसन्न कर सकती है तो वही शब्द किसी को भीतर तक आहत भी कर सकते हैं। इसलिए जीवन में वाणी और शब्दों के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए। वाणी व्यक्ति को अर्श से फर्श पर भी ला सकती है।
अतिशय क्षेत्र में गुरुवार को आयोजित धर्मसभा में भारत गौरव गणिनी आर्यिका रत्न 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने वाणी की शक्ति और शब्दों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए यह प्रेरणास्पद संदेश दिया।
माताजी ने कहा कि अग्नि गर्म है, तेल चिकना है, रेत रूखी है, पानी शीतल है, लोहा कठोर है तो रूई हल्की और मुलायम है। ये सभी गुण पुद्गल के हैं, लेकिन यही गुण हमारे शब्दों और वाणी में भी दिखाई देते हैं।
हम अक्सर कहते हैं कि अमुक व्यक्ति बहुत कठोर बोलता है, किसी की वाणी तीखी है, किसी की आवाज भारी है और कोई बहुत रूखा बोलता है। इससे स्पष्ट होता है कि शब्द महज ध्वनि नहीं हैं, बल्कि उनमें भावों को व्यक्त करने की अद्भुत शक्ति होती है।
उन्होंने कहा कि कर्मों के उदय में जब आत्मा के भाव पुद्गल के साथ जुड़ते हैं, तब हमारे भावों और व्यवहार में भी पुद्गल के गुणों का प्रभाव दिखाई देने लगता है।
आत्मा शब्दातीत, लेकिन संसार में शब्द ही भावों का माध्यम
स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में शब्दातीत है। आत्मा को आत्मा के ज्ञान के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन संसार में अपने भावों को व्यक्त करने के लिए शब्द आवश्यक माध्यम बन जाते हैं।
दुख हो या सुख, किसी बात को समझाना हो या अपनी अनुभूति व्यक्त करनी हो—शब्द ही हमारे भावों को दूसरे तक पहुंचाते हैं। यही शब्द कभी नरम और मधुर होते हैं तो कभी कठोर और तीखे।
शब्दों की शक्ति पहचानें, वाणी को बनाएं साधना का माध्यम
माताजी ने कहा कि शब्दों में अपार शक्ति और गहरा विज्ञान छिपा हुआ है। इन्हीं शब्दों से मंत्रों का निर्माण होता है। जो व्यक्ति शब्दों की शक्ति को पहचान लेता है, वह उनका सदुपयोग कर अपनी वाणी को प्रभावशाली और कल्याणकारी बना सकता है।
इसलिए हमें बोलने से पहले अपने शब्दों पर विचार करना चाहिए कि हमारी वाणी सामने वाले के मन पर कैसा प्रभाव डालेगी। मधुर वाणी रिश्तों को जोड़ती है, जबकि कटु वाणी वर्षों के संबंधों में भी दरार डाल सकती है।
माताजी का संदेश यही रहा कि वाणी को संयमित रखें, शब्दों को मधुर बनाएं और अपनी वाणी को आत्मकल्याण तथा दूसरों के हित का माध्यम बनाएं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312





