रामगंजमंडी की गौरव विभूति: श्रीमती रामकवरी बाई जो क्षुल्लिका 105 श्रुतमती माताजी, थी नगर की पहली दीक्षार्थी 

धर्म

http://Jansamachar24.comरामगंजमंडी की गौरव विभूति: श्रीमती रामकवरी बाई जो क्षुल्लिका 105 श्रुतमती माताजी, थी नगर की पहली दीक्षार्थी 

 

 

तपस्वी सम्राट आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी महाराज से दाहोद में ग्रहण की थी दीक्षा, 1991 में रामगंजमंडी में हुआ था उनका ऐतिहासिक वर्षायोग

 

रामगंजमंडी।

रामगंजमंडी को देशभर में धनिया और कोटा स्टोन की नगरी के रूप में पहचान मिली है, लेकिन इस नगर की धार्मिक और आध्यात्मिक विरासत भी उतनी ही गौरवशाली रही है। इसी गौरवशाली इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय हैं श्रीमती रामकवरी बाई दुगेरिया, जिन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग कर क्षुल्लिका 105 श्रुतमती माताजी के रूप में संयम पथ को अपनाया और रामगंजमंडी का नाम जैन समाज के इतिहास में गौरवान्वित कर दिया।

 

यह नगर के लिए विशेष सौभाग्य का विषय रहा कि तपस्वी सम्राट आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी महाराज का वर्ष 1991 में रामगंजमंडी में वर्षायोग हुआ। उसी महान संत के करकमलों से कुछ वर्षों पूर्व रामकवरी बाई ने दीक्षा ग्रहण कर संयम जीवन का वरण किया था।

मातासरा से रामगंजमंडी तक का प्रेरणादायी जीवन सफर

 

परिवार से प्राप्त जानकारी के अनुसार श्रीमती रामकवरी बाई का जन्म मध्यप्रदेश के मातासरा गांव में हुआ था, जो वर्तमान में गांधी सागर बांध के डूब क्षेत्र में समाहित हो चुका है। उनका विवाह श्री बापूलाल दुगेरिया से हुआ, जो कुंडाल बड़ोदिया के निवासी थे। बाद में पूरा परिवार व्यवसाय के उद्देश्य से रामगंजमंडी आकर बस गया, जहां कृषि उपज मंडी में उन्होंने सफल व्यवसाय स्थापित किया।

उनके एक पुत्र और तीन पुत्रियां थीं। आज उनकी संतति धर्म, समाजसेवा और संस्कारों की परंपरा को आगे बढ़ा रही है। उनके पुत्र स्व. पदम जैन का कुछ वर्ष पूर्व देहावसान हो चुका है।

 

वैराग्य की लौ ने बदल दी जीवन की दिशा

 

उनके पौत्र देवेंद्र जैन दुगेरिया बताते हैं कि पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करने के बाद रामकवरी बाई के मन में वैराग्य का भाव जागृत हुआ। और उन्होंने आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी महाराज से प्रतिमा व्रत भी ग्रहण किए थे।

 

 वर्ष 1986 में जब बालाचार्य श्री 108 योगेन्द्र सागर जी महाराज का रामगंजमंडी में वर्षायोग हुआ, तब उनके भीतर संयम की भावना और प्रबल हो गई। उन्होंने आचार्य श्री योगेंद्र सागर महाराज की निश्रा में रहते हुए धीरे-धीरे पूर्ण संयम जीवन की ओर अग्रसर हो गईं।

 

संस्कारों की ऐसी मिसाल, जो आज भी जीवित है

 

परिवारजन बताते हैं कि गृहस्थ जीवन में भी वे अत्यंत धार्मिक थीं। जब तक घर का कोई सदस्य मंदिर जाकर दर्शन नहीं कर लेता और मस्तक पर तिलक नहीं लगा देखती, तब तक वे भोजन ग्रहण नहीं करने देती थीं। यही संस्कार आज तीसरी और चौथी पीढ़ी तक जीवंत हैं और पूरा परिवार धर्मकार्य एवं सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

 

दाहोद में मिली क्षुल्लिका दीक्षा, मिला ‘श्रुतमती’ नाम इस समय 12 वर्ष की सल्लेखना का व्रत भी ग्रहण किया

 

श्रुत पंचमी के पावन अवसर पर गुजरात के दाहोद में तपस्वी सम्राट आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में उन्होंने क्षुल्लिका दीक्षा ग्रहण की। श्रुत पंचमी के पुण्य पर्व पर दीक्षा होने के कारण आचार्य श्री ने उन्हें क्षुल्लिका 105 श्रुतमती माताजी नाम प्रदान किया। और इस समय उन्होंने 12 वर्ष का सल्लेखना व्रत भी ग्रहण किया।

 

107 वर्ष की आयु में संलेखना पूर्वक समाधिमरण

 

श्रुतमती माताजी ने लगभग 107 वर्ष की आयु पूर्ण की। परिवार के अनुसार उनके जीवन के अंतिम समय में पुनः दूध के दांत आने जैसी आश्चर्यजनक घटना भी देखने को मिली। उन्होंने संलेखना पूर्वक समाधिमरण कर संयममय जीवन को पूर्णता प्रदान की। और उन्होंने 11 साल 11 महीने और 11 दिन मे समस्त प्रकार के अन्न जल का त्याग कर गोधरा पदमावती धाम में समाधि पूर्वक इस नश्वर देह का वरण किया। 

      

ऐसी समाधि पहले देखी आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज 

  जिस दिन माता जी की समाधि हुई उस दिन उन्होंने पहले ही समस्त प्रकार के अन्न जल का त्याग कर दिया था। जानकारी देते हुए उनकी पुत्री श्रीमती विमला ठाई बताती है कि उसे समय तपस्वी सम्राट आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी महाराज ने कहा था कि ऐसी समाधि मैंने मेरे जीवन में पहली बार देखी है। उनका कहना है कि उसे समय आचार्य श्री ने माता जी को कहा कि आहार करे तब माताजी ने कहा कि आज मेरा उपवास है। उन्हें अपने जीवन में पूर्वाभास हो चुका था कि अब मेरा समय निकट है।

 

आज भी उनका संयम उपकरण (कमण्डल) सुरक्षित रखा गया है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

 

रामगंजमंडी की अमूल्य धार्मिक धरोहर

 

क्षुल्लिका 105 श्रुतमती माताजी का जीवन केवल एक परिवार की विरासत नहीं, बल्कि संपूर्ण रामगंजमंडी और जैन समाज के लिए गौरव का विषय है। उनका त्याग, तप, संयम और संस्कार आने वाली पीढ़ियों को सदैव धर्ममार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहेंगे।

 

परिवार की ओर से गृहस्थ अवस्था की पुत्री श्रीमती विमला ठाई, पुत्रवधु श्रीमती कमला बाई दुगेरिया, पौत्र देवेंद्र, सुनील, विजय जैन, तथा परिवार की सदस्य दीपिका, विवेका, नीलू एवं प्रपौत्र-प्रपौत्रियों दीक्षा टिशा, अदिति, अनंत, आराध्या और अर्हम, आदित्य ने इस दुर्लभ ऐतिहासिक जानकारी को उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया।

 

रामगंजमंडी के धार्मिक इतिहास का यह स्वर्णिम अध्याय न केवल नगर का गौरव है, बल्कि जैन समाज की अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर भी है।

 

— अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी की रिपोर्ट9929747312

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