साधन नहीं, साधना और कला ही जीवन को बनाती है सार्थक : स्वस्तिभूषण माताजी
खाट के पाए से निकाली मधुर ध्वनि का प्रसंग सुनाकर समझाया कला और साधना का महत्व
केशवरायपाटन।
अतिशय क्षेत्र में बुधवार को आयोजित धर्मसभा में भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने जीवन में साधनों से अधिक साधना और वस्तुओं से अधिक कला के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि व्यक्ति के पास कितने साधन हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उन साधनों का सदुपयोग करने की कला और भीतर की साधना ही उसके जीवन को सार्थक बनाती है।
माताजी ने एक रोचक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक राजा ने कला की प्रतियोगिता आयोजित की। प्रतियोगिता में एक व्यक्ति अपने साथ कोई वाद्य यंत्र लेकर नहीं आया, बल्कि वह केवल खाट का एक पाया लेकर पहुंच गया। उसने अपनी कला और प्रतिभा से उसी साधारण से पाए पर ऐसी ताल और मधुर ध्वनि उत्पन्न की कि वहां मौजूद सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए।
उन्होंने कहा कि जिसके भीतर कला नहीं है, उसके लिए बड़े से बड़ा वाद्य यंत्र भी व्यर्थ है, लेकिन जिसके भीतर कला है, वह साधारण से साधारण वस्तु को भी अपनी प्रतिभा से विशेष बना सकता है। यही बात जीवन पर भी लागू होती है। साधन जीवन को सुविधा दे सकते हैं, लेकिन साधना जीवन को दिशा देती है।
भक्ति में संगीत आत्मा को करता है स्पर्श
स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि पूजा-पाठ में जब संगीत और भक्ति का समावेश होता है तो मन एकाग्र होने के साथ आनंदित भी होता है। संगीत सीधे अंतरंग को स्पर्श कर भावों को जागृत करता है। जब संगीत, कला और भक्ति एक साथ जुड़ते हैं तो वह केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहता, बल्कि आत्मिक आनंद और आध्यात्मिक अनुभूति का साधन बन जाता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा कि जीवन में बाहरी साधनों की चमक के पीछे भागने के बजाय व्यक्ति को अपनी आंतरिक साधना, कला और भावों को निखारने का प्रयास करना चाहिए। यही जीवन को वास्तविक शांति और आनंद की ओर ले जाता है।
: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312







