उत्तम समाधि मरण को प्राप्त हुए मुनिराज श्री 108 सुकुमाल सागर जी महाराज* 

धर्म

*उत्तम समाधि मरण को प्राप्त हुए मुनिराज श्री 108 सुकुमाल सागर जी महाराज* 

 

नेमी नगर जैन कॉलोनी,इंदौर।

मुनिराज श्री सुकुमाल सागर जी महाराज के समाधि मरण पर आचार्य श्री 108 सुनील सागर जी महाराज ने भावपूर्ण विनयांजलि अर्पित करते हुए कहा संसार में कितना ही सुंदर और स्वस्थ शरीर क्यों न हो, वह प्रत्येक क्षण क्षरण की ओर बढ़ता रहता है। जब संसार में कोई शरण दिखाई नहीं देती, तब अरिहंत प्रभु ही जीव के परम शरण बनते हैं। संसार में हजारों, लाखों और करोड़ों जीव जन्म लेते हैं और चले जाते हैं, लेकिन सौभाग्यशाली वही होते हैं जिन्हें जीवन के अंतिम क्षणों में विवेकपूर्वक उत्तम समाधि मरण प्राप्त होता है।

 

ऐसे ही आत्मकल्याण की साधना का प्रेरणादायी उदाहरण रहे मुनिराज श्री 108 सुकुमाल सागर जी महाराज, जिन्होंने दीर्घ संयम, तप और साधना के पश्चात उत्तम समाधि मरण को प्राप्त किया।

 

मुनिराज श्री सुकुमाल सागर जी महाराज का जन्म 2 अगस्त 1942 को उत्तर प्रदेश के बक्शीपुर, फिरोजाबाद में हुआ था। सांसारिक जीवन का त्याग कर उन्होंने 27 सितंबर 2002 को नरवाली, राजस्थान में तपस्वी सम्राट आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी महाराज से मुनि दीक्षा के संस्कार प्राप्त किए। इसके बाद उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन संयम, साधना और आत्मकल्याण के मार्ग को समर्पित कर दिया।

मुनिराज श्री सुकुमाल सागर जी महाराज का जीवन इस बात का सटीक उदाहरण रहा कि आत्मकल्याण के पथ पर चलने वाला साधक संसार और परिवार के मोह से ऊपर उठकर किस प्रकार अपनी आत्मा की साधना में निरंतर आगे बढ़ सकता है। उन्होंने अपने पूरे परिवार और सांसारिक जीवन को एक समुचित वातावरण में छोड़कर संयम का मार्ग अपनाया और लगभग 24 वर्षों तक कठोर साधना एवं संयम का पालन किया।

 

जीवन के अंतिम समय में भी उनका संयम और साधना के प्रति समर्पण अद्भुत रहा। दुर्घटना में हाथ और मस्तक पर चोट आने के बावजूद उन्होंने अपनी मुनिचर्या का पूर्ण रूप से पालन किया। अंतिम दिनों में उन्होंने लगभग डेढ़ माह से एकांतर उपवास की साधना की और समाधि के पूर्व सात दिनों तक निर्जल उपवास करते हुए अत्यंत विवेक और धैर्य के साथ अपने शरीर से ममत्व का त्याग किया।

 

उनका समाधि मरण केवल जीवन की अंतिम अवस्था नहीं, बल्कि वर्षों की तपस्या, संयम, वैराग्य और आत्मसाधना की परिणति रहा। मुनिराज श्री सुकुमाल सागर जी महाराज ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी साधक के रूप में जागरूकता बनाए रखते हुए उत्तम समाधि मरण को प्राप्त किया।

 

उनका संयममय जीवन और समाधि मरण समाज के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा। उनका जीवन यह संदेश देता है कि शरीर नश्वर है, संसार क्षणभंगुर है, लेकिन आत्मकल्याण के लिए किया गया पुरुषार्थ ही जीव की वास्तविक उपलब्धि है।

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