आठ साल बाद भी रामगंजमंडी की गलियों में गूंजती है वह आवाज… ‘कड़वे प्रवचन’ वाले तरुणसागर जी की यादें आज भी ताजा

समाधि दिवस विशेष : 1996 में जब रामगंजमंडी की धरती पर पड़े थे मुनिश्री के चरण, एक माह तक धर्म और अहिंसा की अलख से गूंजता रहा था नगर
रामगंजमंडी।
कुछ संत चले जाते हैं, लेकिन उनकी स्मृतियां नहीं जातीं।
कुछ आवाजें शांत हो जाती हैं, लेकिन उनके शब्द वर्षों बाद भी कानों में गूंजते रहते हैं।
राष्ट्रसंत मुनिश्री 108 तरुणसागर जी महाराज भी ऐसे ही संत थे।
आज 1 सितंबर है। आठ वर्ष पूर्व इसी दिन मुनिश्री तरुणसागर जी महाराज ने नई दिल्ली में समाधि धारण की थी।
लेकिन रामगंजमंडी के लिए यह केवल समाधि दिवस नहीं है। यह उन स्मृतियों को फिर से जीने का दिन है, जब वर्ष 1996 में मुनिश्री के चरण रामगंजमंडी की पावन माटी पर पड़े थे।
वह एक महीना… जिसे रामगंजमंडी आज भी नहीं भूली
वर्ष 1996 में जब मुनिश्री तरुणसागर जी महाराज रामगंजमंडी पहुंचे, तो उनके स्वागत में पूरा नगर जैसे उमड़ पड़ा था। लोगों ने पलक-पांवड़े बिछाकर संत के आगमन की अगवानी की।
लगभग एक माह का उनका प्रवास रामगंजमंडी के धार्मिक और सामाजिक जीवन में एक अलग अध्याय बन गया।
सुबह से लेकर शाम तक उनके दर्शन और प्रवचन की चर्चा रहती। हर वर्ग के लोग उनकी वाणी सुनने के लिए आतुर रहते।
उनकी वाणी में मिठास से ज्यादा सच्चाई की ताकत थी।
इसीलिए उनके प्रवचन बाद में ‘कड़वे प्रवचन’ के नाम से देशभर में प्रसिद्ध हुए। उनकी शैली सीधी थी, शब्द बेबाक थे और निशाना व्यक्ति नहीं बल्कि उसकी गलत प्रवृत्तियां होती थीं। उनके प्रवचनों में सामाजिक जागरण और आत्मचिंतन का संदेश प्रमुख रहता था।
रामगंजमंडी से कोटा तक चली थी अहिंसा की पदयात्रा
मुनिश्री के रामगंजमंडी प्रवास की एक और याद आज भी विशेष है।
2 फरवरी से 7 फरवरी 1996 तक रामगंजमंडी से कोटा तक अहिंसा और शांति के संदेश को लेकर पदयात्रा निकाली गई।
युवाओं में उस समय जो उत्साह दिखाई दिया, वह अपने आप में उल्लेखनीय था। मुनिश्री के सानिध्य में निकली यह यात्रा केवल कदमों की यात्रा नहीं थी, बल्कि युवा चेतना और अहिंसा के संकल्प की यात्रा थी।
इसी दौरान आयोजित कवि सम्मेलन भी लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना।
मुनिश्री के समीप बैठना, उनकी वाणी सुनना और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना उस समय जिन लोगों को मिला, उनके लिए वह आज भी जीवन की अनमोल स्मृति है।
लाल किले से लेकर जन-जन के हृदय तक
मुनिश्री तरुणसागर जी महाराज की पहचान केवल जैन समाज तक सीमित नहीं रही। उनकी निर्भीक वाणी ने व्यापक समाज को प्रभावित किया।
वर्ष 2000 में दिल्ली के लाल किले से उन्होंने अपने विचार रखे और अहिंसा, शांति तथा सामाजिक जागरण का संदेश दिया। उनके प्रवचनों में धर्म के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी दिखाई देता था।
यही कारण था कि उन्हें ‘क्रांतिकारी संत’ और ‘राष्ट्रसंत’ जैसे संबोधनों से भी याद किया गया।
आज शरीर नहीं, लेकिन शब्द जीवित हैं
मुनिश्री की समाधि को आठ वर्ष बीत गए।
समय आगे बढ़ गया।
नई पीढ़ियां आ गईं।
रामगंजमंडी भी बदल गई।
लेकिन कुछ स्मृतियां समय के साथ पुरानी नहीं होतीं।
1996 में रामगंजमंडी की धरती पर पड़े वे चरण,
उनकी ओजपूर्ण वाणी,
उनके कड़वे लेकिन हितकारी वचन,
युवाओं के साथ निकली वह पदयात्रा
और उनके सानिध्य में बिताए वे दिन—
आज भी अनेक लोगों के मन में वैसे ही जीवंत हैं।
आज समाधि दिवस पर यही भाव मन में उठता है—
जो ज्योति बनकर इस धरा पर आया,
वह तरुणसागर कहलाया।
जिसने अहिंसा का दीप जलाया,
वह तरुणसागर कहलाया।
जिसने सच कहने का साहस सिखाया,
वह तरुणसागर कहलाया।
आपकी वाणी भले आज प्रत्यक्ष सुनाई नहीं देती,
लेकिन आपके शब्द आज भी समाज को आईना दिखाते हैं।
जन-जन की आंखें आज भी नम हैं,
स्मृतियों में आज भी आपका स्थान अमिट है।
रामगंजमंडी की पावन धरती पर आपके आगमन की स्मृतियों को शत-शत नमन।
राष्ट्रसंत मुनिश्री तरुणसागर जी महाराज की समाधि दिवस पर भावभीनी विनयांजलि।
— अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312





