बच्चों की जिज्ञासा को दबाएं नहीं, समझें माता-पिता, तनाव नहीं बढ़ाएं : स्वस्तिभूषण माताजी

धर्म

बच्चों की जिज्ञासा को दबाएं नहीं, समझें माता-पिता, तनाव नहीं बढ़ाएं : स्वस्तिभूषण माताजी

 

बच्चे क्या चाहते हैं और उनके मन में क्या चल रहा है, इसे समझना जरूरी; असफलता में तनाव के बजाय रखें शांत और सकारात्मक भाव

 

केशवरायपाटन।

बच्चों की जिज्ञासा को केवल सवाल-जवाब तक सीमित न समझें, बल्कि उनके मन में चल रही भावनाओं और जानने की इच्छा को समझने का प्रयास करें। माता-पिता बच्चों को केवल पढ़ाई के लिए प्रेरित करने के बजाय यह जानने की कोशिश करें कि वे वास्तव में क्या चाहते हैं और उनके मन में क्या चल रहा है। यह विचार भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने रविवार को श्रीमुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।

 

स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि शारीरिक संरचना और विकास की एक निश्चित सीमा होती है। मनुष्य का शरीर भी एक उम्र तक बढ़ता है और इसके बाद उसकी शारीरिक वृद्धि रुक जाती है। इसी प्रकार संसार के प्रत्येक जीव और वनस्पति की अपनी निश्चित शारीरिक सीमा होती है। आम, गुलाब और गेहूं के पौधे भी अपनी निर्धारित ऊंचाई तक ही बढ़ते हैं।

 

उन्होंने कहा कि जन्म के समय मनुष्य का शरीर छोटा होता है और उसकी बौद्धिक क्षमता भी विकास की अवस्था में रहती है। इसी कारण छोटे बच्चों में जिज्ञासा अधिक होती है। आत्मा में विद्यमान ज्ञान की शक्ति के साथ जानने की इच्छा भी निरंतर बढ़ती रहती है। ऐसे में बच्चों के सवालों और उनकी जिज्ञासाओं को समझना माता-पिता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

 

असफलता को लेकर बच्चों पर तनाव न डालें

 

माताजी ने कहा कि जीवन में सफलता के लिए पुरुषार्थ के साथ पुण्य का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। कई बार बच्चे पूरी तैयारी और मेहनत करने के बावजूद अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में वे तनाव में चले जाते हैं।

 

उन्होंने कहा कि तनाव की स्थिति में अशुभ भाव बढ़ते हैं और पाप कर्म का बंध होता है। इसलिए असफलता मिलने पर तनाव लेने के बजाय शांत और प्रशस्त भाव रखते हुए अपने विचारों को शुद्ध रखना चाहिए।

 

धर्म किसी वस्तु की प्राप्ति का सौदा नहीं

 

स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि जीवन में जो प्राप्त होना है, वह धर्म और पुण्य के माध्यम से ही प्राप्त होगा। धर्म इस भावना से नहीं करना चाहिए कि भगवान हमें कोई वस्तु प्रदान कर दें। भगवान की सच्चे मन से भक्ति और धर्म आराधना करनी चाहिए।

 

उन्होंने कहा कि भाव निर्मल होंगे तो जीवन में जो मिलना है, वह उचित समय पर अपने आप प्राप्त होगा। इसलिए जीवन में पुरुषार्थ, सकारात्मक सोच, धर्म और अच्छे भावों को महत्व देना चाहिए।

 

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी

मो. 9929747312

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