राखी के पावन सूत्र में बंधा धर्म-संरक्षण का संकल्प, 700 मुनिराजों को समर्पित किए अर्घ्य“श्रमण संस्कृति की रक्षा, संतों की सेवा और जीव मात्र में वात्सल्य ही सच्ची धर्मसाधना” — मुनि श्री योगसागर जी महाराज
कोटा, 28 अगस्त।
रक्षाबंधन का पर्व इस बार श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियाजी, दादाबाड़ी में केवल भाई-बहन के प्रेम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि श्रमण संस्कृति के संरक्षण, संतों की सेवा और जीव मात्र के प्रति वात्सल्य का संदेश लेकर आया। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के पावन अवसर पर यहां श्रमण संस्कृति रक्षक दिवस एवं वात्सल्य दिवस श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया।
चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि शिरोमणि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि श्रमण संस्कृति महज परंपरा नहीं, बल्कि त्याग, तप, संयम, अहिंसा और आत्मकल्याण की जीवंत संस्कृति है। इसकी रक्षा करना प्रत्येक श्रावक का परम कर्तव्य है।

उन्होंने कहा कि भगवान महावीर की परंपरा बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि अंतरात्मा की शुद्धता का मार्ग दिखाती है। इच्छाओं को बढ़ाना नहीं, बल्कि इच्छाओं पर विजय प्राप्त करना ही सच्ची स्वतंत्रता है। जिस समाज में संतों के प्रति श्रद्धा और उनकी चर्या के प्रति सम्मान होता है, वही समाज अपनी धर्मपरंपरा, संस्कृति और संस्कारों को सुरक्षित रख सकता है।
संत संस्कृति के प्रहरी, श्रावक उसके संरक्षक
मुनिश्री ने कहा कि श्रमण संस्कृति त्याग, तप, संयम, अहिंसा, अपरिग्रह और आत्मसाधना पर आधारित है। संत अपने जीवन से धर्म का आदर्श प्रस्तुत करते हैं, वहीं श्रावकों का दायित्व है कि वे श्रमण संस्कृति की रक्षा, संतों की सेवा और धर्म की प्रभावना में अपना योगदान दें।
उन्होंने कहा कि संतों के चरणों में बैठकर केवल प्रवचन सुन लेना पर्याप्त नहीं है। संतों की साधना से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में परिवर्तन लाना ही प्रवचन की वास्तविक सार्थकता है।
वात्सल्य परिवार से आगे, जीव मात्र तक पहुंचे
वात्सल्य दिवस का संदेश देते हुए मुनिश्री ने कहा कि वात्सल्य केवल अपने परिवार से प्रेम करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रत्येक जीव के प्रति आत्मीयता, करुणा और मैत्री का भाव होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य के हृदय में प्रेम, क्षमा, सहयोग और सद्भावना जागती है, तभी समाज में एकता आती है और धर्म की प्रभावना होती है। इसलिए रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का पर्व न रहकर जीव मात्र के प्रति वात्सल्य और धर्म-संस्कृति की रक्षा का संकल्प पर्व बने।
अकम्पनाचार्य सहित 700 मुनिराजों को भावपूर्ण अर्घ्य
रक्षाबंधन के ऐतिहासिक एवं गौरवशाली प्रसंग का स्मरण करते हुए सामूहिक विधान का आयोजन किया गया। इसमें अकम्पनाचार्य आदि 700 मुनिराजों को श्रद्धापूर्वक अर्घ्य समर्पित किए गए।
मुनिश्री ने कहा कि यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि श्रमण संस्कृति की रक्षा केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी की भी जिम्मेदारी है। आने वाली पीढ़ियां जैन धर्म के सिद्धांतों को जानें, समझें और जीवन में उतारें, इसके लिए समाज को स्वयं आदर्श प्रस्तुत करना होगा।
एक दिन का त्याग भी बन सकता है सच्ची श्रद्धांजलि
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि श्रमणों की चर्या को केवल देखने और सुनने तक सीमित न रखें, बल्कि उससे प्रेरणा लेकर जीवन में छोटे-छोटे संकल्प धारण करें।
एक दिन का त्याग, किसी एक बुराई का त्याग, किसी के प्रति क्षमा, जरूरतमंद की सहायता अथवा धर्मकार्य में सहयोग—ये सभी श्रमण संस्कृति के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि बन सकते हैं।
उन्होंने कहा कि धर्म के कार्य में किया गया प्रत्येक छोटा प्रयास भी आत्मकल्याण का कारण बन सकता है।
राखी बनी धर्म, जिनालय, शास्त्र और गुरु संरक्षण का संकल्प
रक्षाबंधन के अवसर पर अध्यक्ष, मंत्री एवं समिति के पदाधिकारियों द्वारा मंदिरों में विशेष राखी काउंटर लगाए गए। श्रद्धालुओं ने यहां से राखी प्राप्त कर श्रमण संस्कृति, जिनालय, शास्त्र एवं गुरु की रक्षा की भावना के साथ राखी बंधवाई।
मुनिश्री ने आह्वान किया कि श्रावक तन-मन-धन से श्रमण संस्कृति की रक्षा, संतों की सेवा, धर्म की प्रभावना और समाज में वात्सल्य की भावना को बढ़ाने में अपना योगदान दें।
इन श्रद्धालुओं ने अर्जित किया विशेष पुण्यलाभ
अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ एवं महामंत्री श्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री हुकमचंद सोगानी परिवार, हसित के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में; मनोज मंडी, बमोरा; श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार तथा श्री राजेन्द्र जी, हुकुम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
भगवान श्रेयांसनाथ के मोक्ष कल्याणक दिवस के उपलक्ष्य में निर्वाण लाडू (मोक्ष लड्डू) का पुण्यार्जन श्री गोपाल जी एडवोकेट परिवार द्वारा किया गया।
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ एवं उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन ब्रह्मचारिणी मेना दीदी, मोना दीदी, श्रीमती मुन्नी जी अयाना एवं श्रीमती प्रेमलता जैन, धर्मपत्नी श्री चंद्रप्रकाश जैन (केकड़ी वाले), के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में ऋषभ-मोनिका सोनी परिवार द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री पुण्योदय भक्तामर मंडल द्वारा किया गया।
श्री अर्पित एवं श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य उषा दीदी, कविता जी एवं विधा जैन को प्राप्त हुआ।
वहीं मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमती मंजू जी एवं श्री विनोद जी पाटनी को प्राप्त हुआ।
मंगलाचरण का पुण्य अवसर सुश्री सौम्या जैन ‘सुर नूर’ उपाधि से विभूषित एवं बांसुरी वादन में स्वर्ण पदक प्राप्तकर्ता तथा सुनीता हरसोरा द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक संपन्न किया गया।
धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
गुरुवाणी का अमृत संदेश
“राखी केवल कलाई पर नहीं, धर्म और संस्कृति की रक्षा के संकल्प में बंधे”
श्रमण संस्कृति हमारी पहचान है,
संत उसके प्रकाश हैं और श्रावक उसके प्रहरी।
राखी का यह पावन सूत्र
केवल प्रेम का बंधन नहीं,
बल्कि धर्म, जिनालय, शास्त्र और गुरु की रक्षा का संकल्प बने।
हृदय में वात्सल्य, जीवन में संयम
और कर्मों में धर्म हो—
यही रक्षाबंधन की सच्ची सार्थकता है।
अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी की रिपोर्ट
मोबाइल : 9929747312





