तुमसे लागी लगन ले लो अपनी शरण पारस प्यारा भजन श्री पंकज जी पुण्य तिथि पर विशेष 

धर्म

तुमसे लागी लगन ले लो अपनी शरण पारस प्यारा भजन श्री पंकज जी पुण्य तिथि पर विशेष 

     आज से कही वर्षो पूर्व एक ऐसे व्यक्तित्व ने आज के दिन विदा ली थी लेकिन उनका वह भजन तुमसे लागी लगन ले लो अपनी शरण पारस प्यारा आज भी गुंजित होता है लगता है कि आज भी वह जीवंत है वह ऐसा भजन दे गए जो आज भी धार्मिक समारोह जुलूस में गुंजित होता है।

 

 

तुमसे लागी लगन ले लो अपनी शरण तुम से लागी लगन ले लो अपनी शरण पारस प्यारा मेटो-मेटो जी संकट हमारायह पारस नाथ स्तुति एक एसी कालजयी रचना है जिसे हर आयु वर्ग के जैन अजैन बालक, महिला पुरुष बड़े ही भक्ति भाव से गाते हैं यहां तक की धार्मिक समारोह मे बैण्ड वाले भी यह रचना बजा कर सब का मन मोह लेते हैं। अनेक गीत भजन ऐसे होते हैं जो बहुत लोकप्रिय होकर जन-जन की जुबान पर चढ़े रहते हैं लेकिन समय के साथ-साथ उन्हें बिसरा दिया जाता है लेकिन 1950 में लिखी  तुमसे लागी लगन पुरानी रचना होने पर भी इस कीलोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है।

 

 

बच्चा – बच्चा इस स्तुति को आदरपूर्वक गाता दिखाई देता है। भारत ही नहीं विदेशों में रहने वाले जैन भी बहुत तन्मयता के साथ इसे गाते हैं। इसमें एक पंक्ति आती है +पंकज व्याकुल+पंकज इस रचना के गीतकार है। आचार्य देश भूषण जी महाराज के शिष्य मुनि श्री विद्यानंद जी महाराज भी इस भजन के मार्मिकव सैद्धांतिक शब्दों से बहुत प्रभावित थे।

 

 

आचार्य विद्यानंद जी महाराज मुनि अवस्था में जब जयपुर शहर में अपना प्रथम चातुर्मास किया था तब वे अपनी धर्म सभा के प्रारम्भ में तुम से लागी लगन अपने श्रीमुख से गाकर हजारों श्रोताओं  द्वारा दोहरा कर इस स्तुति को प्रसिद्धि के आसमान। तक पहुंचा दिया।मुनि विद्यानंद जी का प्रिय भजन होने पर भी उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि तुम से लागी लगनके लेखक पंकज का पूरा नाम क्या है और वे कहाँ के है।

 

   एक परिचय 

अजमेर निवासी +पंकज+ का पूरा नाम माणक चन्द जी पाटनी +पंकज था। अपनी ख्याति ओर नाम से दूर रहने वाले पंकजजी मुनि श्री विद्यानंद जी के प्रवचन सुनने जयपुर आते थे, तब मुनि श्री के मुखारविंद से स्वयं काभजन तुम से लागी लगन सुन कर प्रसन्न होते थे। एक बार एक सभा में पीछे बैठे पंकज जी को जयपुर के एक श्रेष्ठीजन ने पहचान कर मुनि श्री विद्यानंद जी को बताया कि तुम से लागी लगन के लेखक आज की सभा में उपस्थित हैं तब मुनिश्री ने प्रसन्नता पूर्वक पंकज जी को मंच पर आमंत्रित किया तब ही मुनि श्री को ज्ञात हुआ कि पंकज जीका पूरा नाम माणक चन्द जी पाटनी – अजमेर वाले हैं। मुनि श्री विद्यानंद जी ने सभा में श्रोताओं से पंकज जी का परिचय कराकर सम्मानित भी किया।

 

 

स्वयं की ख्याति व प्रचार से दूर रहने वाले श्री मानक चन्द जी पाटनी ‘पंकज’ माणक चन्द जी पाटनी पंकज का जन्म सन् 1910 में धर्मनगरी अजमेर में हुआ था। आपकीमाता का नाम बसंती बाई व पिता का नाम भंवरलाल जी पाटनी था । माणक चन्द जी अपने बाल्यकाल से ही कविताएवं शायरी में रूचि रखते थे। तुम से लागी लगनभजन को पसंद करने वाले वेताम्बर जैन मुनि श्री चौथमल जी महाराज साहब ने पंकज जी से परिचयहोने पर उन्हें आशीर्वाद देते हुए धार्मिक गीत लिखने को प्रेरित किया। श्रद्धेय माणक चन्द जी पाटनी +पंकज की लेखन के प्रति लगन को इनके गुरु। अजमेर निवासी उमरावमल जी पाटोदी ने निखारा।उमराव मल जी पाटोदी उस समय जैन समाज केअलावा अजमेर के वरिष्ठ शायरों में अग्रणीय स्थानरखते थे। वे अपने उपनाम वैदिल के नाम से उर्दूके मशहूर शायर थे। पंकज जी ने अपनीअनवरत साधना से अजमेर के जैन कवियों में लोकप्रिय हुए।

 

 

पांच फुट पांच इंच की कद- काटी के गेंहू वर्णिय पंकज जी श्वेत कुर्ता पायजामा व सरपर टेडी काली टोपी धारण करने वाले एकसामान्य, सरल, तथा सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले व्यक्तित्व के धनी, ख्याति प्राप्त करने की लालसारहित कवि थे। आप दिगम्बर जैन संगीत मंडल,अजमेर के मुख्य गायक थे। माणक चन्द जी पाटनी पंकज ने दसवीं तक की शिक्षा प्राप्त कर सोने चांदी का व्यवसाय करने लगे लेकिन घाटा लगने के कारण इस व्यवसाय को बन्द करके सिनेमाव्यवसाय में कदम रखा और राजश्री पिक्चर्स व प्रेम फिल्म्स के फिल्म वितरक के प्रतिनिधि के रूप में काम करते हुए अपनी मेहनत व ईमानदारी से इस क्षेत्र में काफी इज्जत व पैसा कमाया।

 

 

युवा अवस्था में आपका विवाह अजमेर में ही विद्या देवी झांझरी के साथ हुआ। और धरम चन्द नाम का एक पुत्र। हुआ कुछ समय बाद ही विद्या देवी का निधन होने पर पंकज जी टूट से गये थे लेकिन परिवारजनों के दबाव के चलते पंकज जी का दूसरा विवाह वीरग्राम की पांचीबाई से हुआ । इनके दो पुत्र विनयचन्द व श्रेयांस कुमार तथा शकुंतला व निशा नामक दो पुत्रियां हुई।कुछ समय बाद ही ज्येष्ठ पुत्र धरम चन्द व पुत्री शकुन्तला का निधन हो गया। पंकज जी ने अपनेजीवन काल में सभी दिगम्बर जैन तीर्थों की वन्दनाकी पंकज जी गिरनार गौरव आचार्य निरमल सागर जी महाराज से विशेष प्रभावित थे और महाराज का इन पर पूरा आशीर्वाद भी था।

 

 

पंकज जी प्रतिवर्ष गिरनार यात्रा पर जाया करते थे। 18 दिसम्बर सन् 1996 में 86 वर्ष की आयु में पंकज जी का निधनहुआ लेकिन तुम से लागी लगन ले लो अपनी शरणभजन से पंकज जी सद सदा के लिए अमर हो गए।मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज, मुनि श्री अमितसागर जी महाराज की प्रेरणा से पंकज जी के परिजनों ने पंकज जी के लिखे भजनों का संग्रह तीन भागों में वन्दना नामक पुस्तक में प्रकाशित किया है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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