राखी की डोर में बंधी 700 मुनिराजों की रक्षा की अमर गाथा, भक्तिभाव से मनाया श्रेयांसनाथ भगवान का निर्वाण कल्याणक
आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज के सानिध्य में रक्षाबंधन पर्व पर धर्म, त्याग, वात्सल्य और साधु-संरक्षण का दिया संदेश
इंदौर।
नेमी नगर जैन कॉलोनी में आचार्य श्री 108 सुनीलसागर जी महाराज के पावन सानिध्य में रक्षाबंधन का पर्व धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण में मनाया गया। इस अवसर पर भगवान श्रेयांसनाथ के निर्वाण कल्याणक के साथ आचार्य श्री अकंपनाचार्य के उपसर्ग विजय दिवस को भी श्रद्धा और भक्तिभाव से मनाया गया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज ने कहा कि रक्षाबंधन केवल कच्चे धागों से बनी पक्की डोर का पर्व नहीं है, बल्कि यह त्याग, वात्सल्य, प्रेम और धर्म की रक्षा का संदेश देने वाला पावन पर्व है। जैन परंपरा में रक्षाबंधन का पर्व भगवान श्रेयांसनाथ के निर्वाण कल्याणक, आचार्य अकंपनाचार्य की उपसर्ग विजय तथा मुनिराज विष्णुकुमार के अद्भुत त्याग और वात्सल्य की पावन स्मृति से जुड़ा हुआ है।

700 मुनिराजों की रक्षा की अमर गाथा
आचार्य श्री ने रक्षाबंधन के आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि राखी केवल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक नहीं है। यह उस भावना का प्रतीक है, जिसमें संकट के समय किसी की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित करने का भाव जागृत होता है।

उन्होंने बताया कि जब 700 मुनिराजों पर संकट के बादल मंडरा रहे थे, तब मुनिराज विष्णुकुमार ने अपने त्याग, सामर्थ्य और वात्सल्य के माध्यम से उनके संकट को दूर करने का मार्ग अपनाया। धर्म और साधु-संघ के प्रति उनका समर्पण आज भी रक्षाबंधन पर्व को विशेष आध्यात्मिक अर्थ प्रदान करता है।
आचार्य श्री ने कहा कि इतिहास हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम केवल शब्दों और रिश्तों तक सीमित नहीं होता, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर किसी के संकट को अपना समझकर उसके लिए खड़े होना ही सच्चे प्रेम की पहचान है। यही भावना जैन समाज में रक्षाबंधन को वात्सल्य, त्याग और धर्मरक्षा का पर्व बनाती है।
‘राखी कच्चे धागों से बनी पक्की डोर है’
आचार्य श्री ने रक्षाबंधन के भाव को सुंदर शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा—
“राखी कच्चे धागों से बनी पक्की डोर है,
राखी प्यार और मीठी शरारतों की होड़ है।
राखी भाई की लंबी उम्र की दुआ है,
राखी बहन के पवित्र प्यार की दुआ है।”
इन भावपूर्ण पंक्तियों ने धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं के मन को भावविभोर कर दिया।
श्रेयांसनाथ भगवान के चरणों में चढ़ाया निर्वाण लाडू
इस अवसर पर भगवान श्रेयांसनाथ का निर्वाण कल्याणक भी श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। निर्वाण कल्याणक के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं ने भगवान के चरणों में भक्तिभावपूर्वक निर्वाण लाडू अर्पित किया और मोक्षमार्ग के प्रति अपनी श्रद्धा समर्पित की।
राखी बनाओ प्रतियोगिता में दिखी रचनात्मकता
कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने ‘राखी बनाओ प्रतियोगिता’ में उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रतियोगिता की खास बात यह रही कि प्रतिभागियों ने अपने हाथों से राखियां तैयार कीं। धार्मिक भावनाओं, रचनात्मकता और प्रेम को सुंदर राखियों में पिरोकर प्रतिभागियों ने आयोजन को और भी आकर्षक बना दिया।
प्रतियोगिता के दौरान पूरे परिसर में उत्साह और उमंग का वातावरण दिखाई दिया। श्रद्धालुओं ने रक्षाबंधन के पारंपरिक स्वरूप के साथ-साथ इसके आध्यात्मिक संदेश को भी आत्मसात किया।
धागे से आगे बढ़कर धर्मरक्षा का संकल्प
रक्षाबंधन के इस पावन अवसर पर भाई-बहन के प्रेम के साथ मुनिराज विष्णुकुमार के त्याग, 700 मुनिराजों के प्रति उनके वात्सल्य और आचार्य अकंपनाचार्य की उपसर्ग विजय को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया।
आचार्य श्री के संदेश ने रक्षाबंधन के भाव को एक नई दिशा दी। उन्होंने बताया कि राखी केवल कलाई पर बांधा जाने वाला धागा नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, त्याग और रक्षा के संकल्प की प्रतीक है।
वास्तव में रक्षाबंधन हमें यह प्रेरणा देता है कि जब धर्म, साधु-संतों और समाज के मूल्यों पर संकट आए, तब केवल भावनाएं व्यक्त करना पर्याप्त नहीं, बल्कि वात्सल्य, त्याग और समर्पण के साथ रक्षा के लिए खड़ा होना ही सच्चा धर्म है।
यही कारण है कि जैन परंपरा में रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते का पर्व नहीं, बल्कि धर्मरक्षा, साधु-संरक्षण और त्याग-वात्सल्य की अमर गाथा को स्मरण करने वाला प्रेरणादायी पर्व है।
माही जैन धीरावत, पीपलखूंट, प्रतापगढ़ से प्राप्त जानकारी।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मोबाइल : 9929747312






