“रक्षाबंधन पर अकंपनाचार्य सहित 700 मुनिराजों को अर्घ समर्पित, भगवान श्रेयांसनाथ के मोक्षकल्याणक पर चढ़ाया निर्वाण लाडू
रक्षाबंधन केवल बाहरी राखी नहीं, आत्मा को कषायों से बचाने का संकल्प है—राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज”
गिरीडीह (मधुबन)।
राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज एवं मुनि श्री संधान सागर जी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में गुणायतन परिसर, मधुवन में पूर्णिमा एवं रक्षाबंधन पर्व श्रद्धा, भक्ति और वात्सल्य भाव के साथ मनाया गया। प्रातःकाल आयोजित विशेष रक्षाबंधन पूजन में अकंपनाचार्य सहित 700 मुनिराजों को श्रद्धापूर्वक अर्घ समर्पित किए गए।
इसके पश्चात भगवान श्रेयांसनाथ के मोक्षकल्याणक के अवसर पर संकुल कूट की कल्पना कर गुणायतन परिसर में श्रद्धालुओं द्वारा निर्वाण लाडू चढ़ाया गया।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि पूर्णिमा के शुभ अवसर पर राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज के मुखारविंद से लगभग 55 मिनट की वृहद शांतिधारा संपन्न हुई। दोपहर में सामूहिक रूप से रक्षाबंधन पर्व को वात्सल्य पर्व के रूप में मनाया गया। देश के विभिन्न हिस्सों से आए श्रद्धालुओं एवं तीर्थयात्रियों ने पर्वत वंदना कर तथा विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों और शंका समाधान कार्यक्रम में सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त किया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम और पारिवारिक संबंधों का पर्व नहीं है। जैन परंपरा में यह पर्व धर्म की रक्षा, संयम की सुरक्षा और विपरीत परिस्थितियों में भी आत्मिक समता बनाए रखने का महान संदेश देता है।

मुनि श्री ने कहा कि इतिहास में अनेक उतार-चढ़ाव आए, लेकिन दिगंबर मुनिराजों ने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अहिंसा, संयम और समता का मार्ग नहीं छोड़ा। मुनिराज का जीवन करुणा और जीवदया का प्रतीक होता है। वे सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों की रक्षा का भाव रखते हैं तथा समस्त प्राणियों के प्रति समभाव रखते हैं।
आचार्य कुंदकुंद स्वामी के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए मुनि श्री ने कहा कि वास्तविक साधक वही है, जो सुख-दुःख, निंदा-प्रशंसा, लाभ-हानि और जीवन-मरण जैसी परिस्थितियों में समान भाव रख सके। जिसके लिए सोना और मिट्टी समान हो जाए, प्रशंसा और निंदा में अंतर समाप्त हो जाए तथा विपरीत परिस्थितियां भी जिसके मन की शांति को भंग न कर सकें, वही वास्तविक अर्थों में समता का साधक है।
रक्षाबंधन पर्व से जुड़ी अकंपनाचार्य एवं 700 मुनिराजों की ऐतिहासिक कथा का उल्लेख करते हुए मुनि श्री ने कहा कि एक समय अकंपनाचार्य के विशाल मुनि संघ पर धर्म विरोधी लोगों ने घोर उपसर्ग किया। कुछ लोगों ने राजा के कान भरकर मुनि संघ के प्रति दुर्भावना उत्पन्न कर दी। परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए आचार्यश्री ने अपने संघ को मौन एवं संयम बनाए रखने का निर्देश दिया।
इसके बाद मुनि संघ को अनेक प्रकार के कष्ट और उपसर्ग सहने पड़े, किंतु उन महान तपस्वियों की समता और साधना में कोई कमी नहीं आई। बाहरी रूप से शरीर कष्ट सह रहा था, किंतु मुनिराज अपने आत्मस्वरूप में लीन रहे। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों को भी अपनी साधना और आत्मकल्याण का माध्यम बना लिया।
मुनि श्री ने कहा कि सामान्य मनुष्य को कोई एक कटु शब्द कह दे तो वह वर्षों तक उसके प्रति द्वेष रख सकता है और बदला लेने की भावना मन में पाल सकता है। इसके विपरीत दिगंबर मुनिराजों की साधना इतनी उच्च होती है कि वे शरीर पर आने वाले बड़े से बड़े संकट को भी आत्मा से अलग समझते हैं। यही अध्यात्म की शक्ति है कि व्यक्ति शरीर और आत्मा के भेद को समझकर परिस्थितियों से ऊपर उठ सके।
उन्होंने कहा कि जीवन में धर्म की रक्षा करते समय भी विवेक आवश्यक है। सत्य का पक्ष अवश्य लेना चाहिए, लेकिन देश, काल, परिस्थिति और अपनी शक्ति का विचार करना भी जरूरी है। केवल भावावेश में आकर ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए, जिसके परिणाम स्वयं और दूसरों के लिए कठिनाई उत्पन्न करें। धर्मरक्षा का कार्य साहस के साथ-साथ विवेक और संयम से किया जाना चाहिए।
राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में यह भी विचार करना चाहिए कि वह अपने परिणामों को किस दिशा में ले जा रहा है। द्वेष, हिंसा, ईर्ष्या और प्रतिशोध के भाव व्यक्ति को अशुभ परिणामों की ओर ले जाते हैं, जबकि समता, क्षमा, भक्ति और आत्मचिंतन जीवन को श्रेष्ठ दिशा प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन के अवसर पर हमें केवल दूसरों से अपनी रक्षा की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपने भीतर की आत्मा को क्रोध, मान, माया, लोभ, ईर्ष्या और प्रतिशोध जैसे कषायों से बचाने का संकल्प लेना चाहिए। वास्तविक रक्षाबंधन वही है, जिसमें व्यक्ति अपने धर्म, चरित्र और आत्मिक मूल्यों की रक्षा करे।
मुनि श्री ने वात्सल्य भाव का महत्व बताते हुए कहा कि सम्यग्दर्शन के अंगों में धर्मात्माओं और साधुओं के प्रति निष्कपट श्रद्धा एवं प्रेम का विशेष स्थान है। जब पुण्य के योग से संयमी संतों का सान्निध्य प्राप्त हो, तो उसे सामान्य अवसर नहीं समझना चाहिए। संतों के दर्शन, वंदना और धर्मोपदेश का लाभ लेकर अपने जीवन को धर्ममय बनाने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि तीर्थंकरों के कल्याणक केवल उत्सव मनाने के अवसर नहीं हैं, बल्कि वे हमें अपने जीवन के उद्देश्य और कर्तव्य का स्मरण कराते हैं। भगवानों और महान तपस्वियों के जीवन से प्रेरणा लेकर हमें अपने आचरण में भी संयम, समता और करुणा को स्थान देना चाहिए।
राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि रक्षाबंधन का वास्तविक संदेश केवल बाहरी राखी तक सीमित नहीं है। यदि व्यक्ति अपने भीतर के क्रोध और द्वेष को समाप्त नहीं करता, तो बाहरी रक्षा का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाता है। अपनी आत्मा को कषायों से बचाना, संयम की रक्षा करना और धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहना ही वास्तविक रक्षाबंधन है।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भगवान के अभिषेक, वृहद शांतिधारा, रक्षाबंधन विशेष पूजन एवं धार्मिक कार्यक्रमों में सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त किया। देश के विभिन्न भागों से आए तीर्थयात्रियों ने पर्वत वंदना की तथा शंका समाधान कार्यक्रम में भी सहभागिता की।
— राष्ट्रीय प्रवक्ता
अविनाश जैन विद्यावाणी से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी9929747312







