दूसरों को ध्यान से सुनना सीखें, यही कला व्यक्तित्व को बनाती है महान : गणिनी स्वस्तिभूषण माताजी
केशवरायपाटन में धर्मसभा में माताजी ने कहा—विवेक से बोलना और धैर्य से सुनना, जीवन की बड़ी कला
केशवरायपाटन।
अतिशय क्षेत्र में आयोजित धर्मसभा में भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने जीवन में सुनने और बोलने की कला के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य के पास बोलने और सुनने की अद्भुत क्षमता है, लेकिन उसका सही समय, सही स्थान और सही तरीके से उपयोग करना ही वास्तविक विवेक है।
माताजी ने कहा कि कब बोलना है, कितना बोलना है और कब शांत रहकर सामने वाले को सुनना है—इसका विवेक जीवन को सुंदर बना देता है। अक्सर व्यक्ति दूसरे की बात पूरी होने से पहले ही अपनी बात रखने लगता है। यह आदत संवाद को कमजोर करती है। इसके विपरीत जो व्यक्ति धैर्यपूर्वक दूसरों की बात सुनता है, वह न केवल सामने वाले को सम्मान देता है, बल्कि स्वयं भी सही ढंग से बोलना सीख जाता है।
उन्होंने कहा कि जो दूसरों को ध्यान से सुनने की कला सीख जाता है, उसके व्यक्तित्व में अपने आप बड़ा आकर्षण आ जाता है। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में धैर्य से सुनने और विवेकपूर्वक बोलने का निरंतर अभ्यास करना चाहिए।
71 कलाएं जीवन को संवारती हैं, एक कला मोक्ष की ओर ले जाती है
गणिनी माताजी ने भगवान आदिनाथ द्वारा बताई गई 72 कलाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें 71 कलाएं मनुष्य के सांसारिक जीवन को सुंदर, व्यवस्थित और समृद्ध बनाने में सहायक हैं, जबकि एक कला ऐसी है जो जीव को मोक्ष के मार्ग की ओर ले जाती है।
उन्होंने कहा कि सांसारिक कलाएं जीवन को बेहतर बनाने में सहायक हो सकती हैं, लेकिन आत्मकल्याण की कला ही जीव के वास्तविक उद्धार का मार्ग प्रशस्त करती है। मनुष्य को बाहरी उपलब्धियों के साथ-साथ उस एक ऐसी कला को पहचानने की आवश्यकता है, जो उसे अपने भीतर झांकने, आत्मचिंतन करने और आत्मोद्धार की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दे।
माताजी ने धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि जीवन में बोलने की कला से अधिक महत्वपूर्ण सुनने की कला है और सांसारिक कलाओं से भी श्रेष्ठ आत्मकल्याण की कला है।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
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