शक्कर की महंगी मिठास ने फीका किया त्योहारों का रंग, अब  मिठाई से पहले जेब का हिसाब विशेष आलेख | जनसमाचार 24

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शक्कर की महंगी मिठास ने फीका किया त्योहारों का रंग, अब  मिठाई से पहले जेब का हिसाब विशेष आलेख | जनसमाचार 24

 

त्योहार आते ही घरों में मिठास घुलने लगती है। बाजार रंग-बिरंगी मिठाइयों से सज जाते हैं, रसोई में पकवानों की खुशबू फैलती है और रिश्तेदारों के बीच मिठाई के डिब्बे खुशियां बांटते हैं। लेकिन इस बार त्योहारों की इस मिठास पर महंगाई की कड़वाहट का साया दिखाई दे रहा है। शक्कर के बढ़ते दामों ने मिठाई की लागत बढ़ा दी है और आम आदमी को त्योहार मनाने से पहले अपनी जेब का हिसाब लगाने पर मजबूर कर दिया है।

 

हाल के दिनों में देशभर में चीनी की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। रिपोर्टों के अनुसार खुदरा बाजार में कई जगह कीमतें ₹60-70 प्रति किलो के आसपास पहुंच गई हैं और पिछले कुछ सप्ताह में इसमें उल्लेखनीय तेजी आई है।

 

 

एक किलो चीनी महंगी हुई तो असर सिर्फ चाय के कप पर नहीं पड़ा

 

चीनी केवल चाय और दूध में इस्तेमाल होने वाली चीज नहीं है। भारतीय त्योहारों की पूरी मिठास इससे जुड़ी हुई है। लड्डू हों या पेड़े, जलेबी हो या गुलाबजामुन, बर्फी हो या रसगुल्ला—अधिकांश मिठाइयों में चीनी प्रमुख कच्चा माल है।

इसलिए चीनी के दाम बढ़ने का सीधा असर मिठाई की लागत पर पड़ता है। इसके साथ दूध, मावा, ड्राई फ्रूट्स, घी और अन्य सामग्री के दाम भी यदि ऊंचे हों तो मिठाई की कीमत और बढ़ जाती है। ऐसे में त्योहार पर एक किलो मिठाई खरीदने वाला ग्राहक भी अब पहले की तुलना में ज्यादा रकम खर्च करने को मजबूर हो सकता है। विशेषज्ञों ने भी आशंका जताई है कि चीनी महंगी रहने पर त्योहारों में मिठाई, बिस्किट, केक और अन्य मीठे उत्पादों की कीमतों पर असर पड़ सकता है।

 

मिठाई वालों की भी बढ़ी चिंता

 

बढ़ती लागत का असर केवल ग्राहकों पर नहीं है। मिठाई बनाने वाले छोटे दुकानदार भी मुश्किल में हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लागत बढ़ने के बावजूद ग्राहकों को नाराज किए बिना कीमत कैसे तय की जाए।

 

मिठाई की कीमत बढ़ाते हैं तो ग्राहक कम खरीद सकता है और कीमत नहीं बढ़ाते तो मुनाफा प्रभावित होता है। यही वजह है कि इस बार त्योहारों में मिठाई की दुकानों पर ‘मिठास कितनी और बजट कितना?’ का सवाल पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।

 

त्योहार खुशी का है, हिसाब-किताब का नहीं

 

त्योहार भारतीय जीवन में केवल खरीदारी का अवसर नहीं, बल्कि रिश्तों को मजबूत करने और खुशियां बांटने का माध्यम हैं। लेकिन जब जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो सबसे पहले मध्यमवर्गीय और निम्न आय वर्ग के परिवारों का बजट प्रभावित होता है।

 

पहले जहां त्योहार पर घर में कई तरह की मिठाइयां बनती थीं, वहीं अब परिवार मात्रा कम करने या सीमित विकल्प चुनने के बारे में सोच सकता है। बाजार में भी महंगी मिठाई के कारण ग्राहक छोटी पैकिंग या कम मात्रा की ओर रुख कर सकते हैं।

 

सवाल सिर्फ शक्कर की कीमत का नहीं, बाजार के भरोसे का भी है

 

चीनी की कीमत बढ़ने के पीछे उत्पादन, मौसम, आपूर्ति और बाजार की परिस्थितियों सहित कई कारणों पर चर्चा हो रही है। केंद्र सरकार ने हालात संभालने के लिए शुल्क-मुक्त कच्ची चीनी के आयात की अनुमति दी है। वहीं उद्योग संगठन का कहना है कि देश में पर्याप्त स्टॉक है और घबराने की जरूरत नहीं है।

 

ऐसे में आम उपभोक्ता की उम्मीद यही है कि बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनी रहे और त्योहारी सीजन में कीमतों पर अनावश्यक दबाव न बढ़े।

 

मिठास पर महंगाई की परत कितनी मोटी होगी?

 

आने वाले दिनों में त्योहारों की मांग बढ़ने के साथ चीनी की कीमतों पर नजर बनी रहेगी। अगर समय रहते बाजार में पर्याप्त आपूर्ति पहुंचती है तो उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन यदि कीमतों में तेजी लंबे समय तक बनी रही तो इसका असर मिठाई से लेकर बेकरी और रोजमर्रा की कई खाद्य वस्तुओं तक दिखाई दे सकता है।

 

त्योहारों की असली मिठास तब है, जब हर घर बिना जेब पर भारी बोझ डाले खुशियां मना सके।

 

शक्कर महंगी हो सकती है, लेकिन उम्मीद है कि बाजार की यह कड़वाहट त्योहारों की खुशियों पर हावी न हो। जरूरत है कि सरकार, व्यापार जगत और बाजार की पूरी व्यवस्था मिलकर ऐसी स्थिति बनाए कि मिठाई की कीमत बढ़े तो भी आम आदमी की मुस्कान की कीमत न बढ़े।

 

क्योंकि त्योहार मिठाई के डिब्बे से नहीं, अपनों के साथ बांटी गई खुशी से मीठे होते हैं।

   अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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