बदलते चेहरे के बीच आत्मा का निखार ही सच्ची पहचान — आचार्य श्री सुनीलसागर जी
इंदौर।
नेमी नगर जैन कॉलोनी में मंगल प्रवचन के दौरान आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज ने मानव जीवन की वास्तविक सुंदरता और आत्मिक निखार पर प्रकाश डालते हुए कहा कि फैशन बदलता है, चेहरे बदलते हैं, शरीर बदलता है, लेकिन आत्मा की पहचान उसके भावों और कर्मों से होती है।
उन्होंने कहा कि समय के साथ चेहरे की सुंदरता ढल जाती है और शरीर भी परिवर्तन के नियम के अधीन है। जन्म-मरण के इस अनवरत संसार में जीव न जाने कितनी बार शरीर, चेहरे और मन की अवस्थाएं बदल चुका है। इन तमाम बदलावों के बीच यदि वास्तव में कुछ संवारने योग्य है, तो वह है अपनी आत्मा और अपने भाव।
बाहरी सुंदरता नहीं, भीतर का निखार जरूरी
आचार्य श्री ने कहा कि मानव जीवन केवल सांसारिक सुख-सुविधाएं जुटाने के लिए नहीं मिला है, बल्कि यह स्वयं को बदलने, अपने दोषों को दूर करने और आत्मा को निखारने का दुर्लभ अवसर है। इसी जीवन में एक सामान्य संसारी जीव अपने पुरुषार्थ से सिद्धत्व की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार व्यक्ति अपने चेहरे को सुंदर बनाने के लिए आईने के सामने समय देता है, उसी प्रकार उसे अपने भीतर झांकने के लिए भी समय निकालना चाहिए। बाहरी रूप-सज्जा क्षणिक है, लेकिन निर्मल भावों की सुंदरता जीवन को नई दिशा देने वाली होती है।
चेहरे पर मुस्कान, मन में क्या है?
आचार्य श्री सुनीलसागर जी ने कहा कि आज मनुष्य बाहरी दुनिया में अनेक मुखौटे पहनकर जीवन जी रहा है। चेहरे पर मुस्कान है, शब्दों में मिठास है, लेकिन मन के भीतर क्या चल रहा है, यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
मन के स्वार्थ, छल, कपट, ईर्ष्या और खोटे भाव व्यक्ति की बाहरी सुंदरता को भी फीका कर देते हैं। इसके विपरीत जिसके भीतर सरलता, सत्य, करुणा, प्रेम और आत्मजागृति है, उसका व्यक्तित्व बिना किसी बनावटी श्रृंगार के भी आकर्षक दिखाई देता है।
आत्मा को संवारना ही जीवन की सच्ची सफलता
उन्होंने कहा कि वास्तविक निखार महंगे कपड़ों, बदलते फैशन या सुंदर चेहरे में नहीं, बल्कि निर्मल भावों, सच्चे मन और आत्मिक जागृति में है। जिसने अपने भीतर को संवार लिया, उसने जीवन की सबसे बड़ी सुंदरता पा ली।
आचार्य श्री ने प्रेरणा देते हुए कहा कि चेहरा कितना सुंदर है, यह समय तय करता है; लेकिन आत्मा कितनी सुंदर है, यह हमारे भाव और कर्म तय करते हैं। इसलिए जीवन में बाहरी रूप से अधिक अपने भीतर के रूप को सुंदर बनाने का पुरुषार्थ करना चाहिए। यही आत्मकल्याण का मार्ग है और यही मानव जीवन की सार्थकता है।
माही जैन धीरावत, पीपलखूंट (प्रतापगढ़) से प्राप्त जानकारी।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो.: 9929747312
