स्वाद छोड़ा तो तन स्वस्थ, विवाद छोड़ा तो रिश्ते मजबूत : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

धर्म

स्वाद छोड़ा तो तन स्वस्थ, विवाद छोड़ा तो रिश्ते मजबूत : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

पुष्पगिरी सोनकच्छ।

जीवन में सुख और शांति पाने के लिए केवल विचारों को बदलना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि अपनी थाली और वाणी दोनों को शुद्ध करना जरूरी है। स्वाद पर संयम शरीर को स्वस्थ रखता है, जबकि विवाद से दूरी रिश्तों में मिठास घोलती है। यह प्रेरक संदेश व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने पुष्पगिरी तीर्थ पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिया।

 

 

आचार्यश्री ने कहा— “स्वाद और विवाद दोनों छोड़ देना चाहिए। स्वाद को छोड़ो तो शरीर को फायदा और विवाद को छोड़ो तो संबंधों को फायदा।”

परम पूज्य पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के सान्निध्य में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज ससंघ पुष्पगिरी तीर्थ पर वर्षायोग हेतु विराजमान हैं। उनके सान्निध्य में विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम निरंतर आयोजित हो रहे हैं।

जैसा भोजन, वैसा भजन

धर्मसभा में आचार्यश्री ने भोजन की शुद्धता को जीवन की शुद्धता से जोड़ते हुए कहा कि भोजन का जीवन से गहरा संबंध है। जैसा भोजन होगा, वैसा ही भजन होगा।

उन्होंने कहा—
“यदि भोजन शुद्ध नहीं है तो भजन शुद्ध नहीं होगा। जिसका खानपान शुद्ध नहीं है, उसका खानदान शुद्ध नहीं है। जिसकी रोटी शुद्ध नहीं है, उसकी बेटी शुद्ध नहीं है और जिसका आहार शुद्ध नहीं है, उसका व्यवहार शुद्ध नहीं है।”

आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से भोजन के प्रति अपनी दृष्टि बदलने का आह्वान करते हुए कहा कि भोजन करते समय यह भाव रखना चाहिए कि “मैं केवल अपने शरीर के लिए भोजन नहीं कर रहा, बल्कि मेरे भीतर विराजमान आत्मदेव को अर्घ्य अर्पित कर रहा हूं।”

उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति भोजन को आत्मदेव के प्रति अर्पण मानकर ग्रहण करे, तो वह स्वयं ही अपवित्र और अहितकारी पदार्थों से दूर होने लगेगा। जिस प्रकार भगवान की पवित्र प्रतिमा के सामने अपवित्र वस्तुओं का भोग नहीं लगाया जा सकता, उसी प्रकार अपने भीतर विराजमान आत्मा को भी अशुद्ध आहार अर्पित करने की भावना नहीं होनी चाहिए।

आचार्यश्री ने मांसाहार, शराब, बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू और गुटखा जैसे व्यसनों से दूर रहने की प्रेरणा देते हुए कहा कि शरीर केवल भोग का साधन नहीं, बल्कि आत्मकल्याण का माध्यम है। इसलिए आहार की शुद्धता के साथ विचार, व्यवहार और जीवनचर्या की शुद्धता भी जरूरी है।

थाली सुधरेगी तो विचार सुधरेंगे, विचार सुधरेंगे तो जीवन

आचार्यश्री के संदेश का सार यही है कि स्वाद पर नियंत्रण शरीर को स्वस्थ रखता है और विवाद पर नियंत्रण संबंधों को मधुर बनाता है। जब व्यक्ति अपनी थाली में संयम और अपनी वाणी में मिठास ले आता है, तभी जीवन में वास्तविक शांति का प्रवेश होता है।

इस अवसर पर दैनिक अमृत संदेश, भोपाल के संपादक राकेश गोयल ने सहपरिवार पुष्पगिरी पहुंचकर अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज के दर्शन किए तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।

प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल से प्राप्त जानकारी के आधार पर संकलन — अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी। 9929747312

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