अक्षय तृतीया दान पर्व व श्रमण परम्परा के युग का प्रारम्भ दिवस,जैन धर्म मे विशेष महत्व**प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव भगवान का 399 दिन उपरांत इक्षु रस से हुआ पारणा*
*अक्षय तृतीया पर विशेष आलेख
वैशाख शुक्ल तृतीया का विशेष दिन अक्षय तृतीया के रूप में अन्य धर्मो व परंपराओं में आयोजित किया जाता है। तो वहीं जैन धर्म में भी इस दिवस का विशेष महत्व है। इस दिवस पर श्रमण संस्कृति के युग का प्रारंभ हुआ था यूं कहें कि दान के महत्व से समस्त संसार को परिचित कराया गया था तो कोई अतिशक्ति नहीं होगी। साधारण शब्दों में इस दिवस को दान पर्व के रूप में भी मनाया जाता है।
*भोग भूमि से कर्म भूमि युग का प्रारम्भ* जैन दर्शन के अनुसार महाराजा ऋषभदेव के शासनकाल से पूर्व भोग भूमि का काल चल रहा था। तब कल्पवृक्षों के माध्यम से सब कुछ प्राप्त हो जाता था और व्यक्ति कर्म से बहुत दूर था। किंतु युग परिवर्तन से भोग भूमि से कर्मभूमि के युग का प्रारंभ हुआ। तब भगवान ऋषभदेव ने दिगम्बर मुनि अवस्था मे संपूर्ण विश्व को छह महत्वपूर्ण शिक्षाएं प्रदान कर जीवनोपार्जन का मार्ग बतलाया। भगवान आदिनाथ ने मनुष्य को अपना जीवन जीने के लिए 6 कार्य असि -रक्षा करने के लिए अर्थात सैनिक कर्म , मसि – लिखने का कार्य अतार्थ लेखन, कृषि – खेती करना एवं अन्ना उगाना, विद्या- ज्ञान प्राप्त करने से संबंधित कार्य, वाणिज्य- व्यापार से संबंधित कार्य एवं शिल्प मूर्तियों, नक्काशी एवं भवन का निर्माण करना सिखाया।
*महाराजा ऋषभदेव(आदिनाथ) को वैराग्य* महाराजा ऋषभदेव का शासन काल अयोध्या नगरी में उत्कृष्ट चल रहा था और उनकी जीवन शैली भी लोगों को प्रोत्साहन दे रही थी। एक दिवस महाराजा ऋषभदेव के दरबार में नर्तकी नीलांजना की नृत्य के दौरान मृत्यु हो गई। उसे देखकर महाराजा ऋषभदेव को वैराग्य का स्मरण हुआ और उन्होंने अपना राज पाठ पुत्र भरत को सौंप कर दिगंबर दीक्षा धारण मुनि परम्परा को पुनर्जीवित करने का मानस बनाया।वैराग्य पथ पर बढ़ चले।
*399 दिवस उपरांत मिला आहार* वैराग्य के पथिक महामुनी ऋषभदेव ने एक ही स्थान पर खड़े होकर 6 माह तक तप किया और तप करते-करते उन्हें यह स्मरण हुआ कि लोग दिगंबर मुनि की चर्या व दान की परम्परा को भूल चुके हैं।अतः दिगंबर मुनि चर्या से परिचित कराने हेतु विहार पर निकले और आहार की विधि ली। नगरी- नगरी, शहर-शहर ,गांव- गांव दिगंबर मुनिराज को देखकर लोग आश्चर्य चकित होते और उन्हें विभिन्न प्रकार की वस्तुएं आभूषण आदि देकर आमंत्रित करते। चर्या से अनभिज्ञता के कारण लगभग सात माह तक आहार नही हो सका। वर्तमान युग में जहां एक दिन भोजन न मिलने पर हम तड़पते रहते हैं वहां मुनिराज ऋषभदेव को 399 दिवस गुजर चुके थे। तब एक दिवस हस्तिनापुर के राजा श्रेयांश को स्वप्न में पूर्व जाति स्मरण हुआ और उन्हें भान हुआ की मुनिराज ऋषभदेव हस्तिनापुर नगरी की ओर आ रहे है। तब उन्होंने नवधा भक्ति के साथ महामुनि ऋषभदेव का वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन पड़गाहन कर उन्हें इछु रस अर्थात गन्ने का आहार कराया और वही से इस वैशाख शुक्ल तृतीया जिसे अक्षय तृतीया भी कहा जाता है के पावन दिवस श्रमण व दान परम्परा का प्रारम्भ हुआ।
जैन धर्म में इस दिवस को जहां दान पर्व के रूप में मनाया जाता है वहीं युग परिवर्तन दिवस के रूप में भी देखा जाता है। अक्षय तृतीया का यह दिवस सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त के रूप में भी जाना जाता है। इस दिवस का कभी क्षय नहीं होता इसलिए इसे अक्षय भी माना जाता है।
भगवान ऋषभदेव जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर थे तो उनके उपरांत 23 तीर्थंकर और हुए इस श्रृंखला में भगवान महावीर 24 वे व अंतिम तीर्थंकर थे।
लोगो मे भ्रांति है कि जैन धर्म का प्रवर्तन भगवान महावीर से हुआ। हम सबको मिलकर इस महापर्व को महत्वपूर्ण आयोजनों के साथ आयोजित करना चाहिए।
*संजय जैन बड़जात्या कामां,राष्ट्रीय प्रचार मंत्री धर्म जागृति संस्थान*
