प्रशंसा से पिघलना मत, क्रोध से जलना मत… आलोचना से उबलना मत, अजनबी के शब्दों में फिसलना मत : अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

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प्रशंसा से पिघलना मत, क्रोध से जलना मत… आलोचना से उबलना मत, अजनबी के शब्दों में फिसलना मत : अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

पुष्पगिरि सोनकच्छ। मनुष्य का मन सुख-सुविधाओं की चाह में अक्सर ऐसी अपेक्षाएं पाल लेता है, जिनका वास्तविक जीवन में कोई आधार नहीं होता। जीवन में सफलता और आत्मिक शांति के लिए जरूरी है कि व्यक्ति प्रशंसा और आलोचना, सुख और दुख—दोनों परिस्थितियों में स्वयं पर नियंत्रण बनाए रखे। यही संदेश अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज ने पुष्पगिरि सोनकच्छ में प्रातःकालीन प्रवचन के दौरान गुरु भक्तों को दिया।

आचार्य श्री ने प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए कहा—“प्रशंसा से पिघलना मत, क्रोध से जलना मत, आलोचना से उबलना मत और अजनबी के शब्दों में फिसलना मत।” उन्होंने कहा कि मनुष्य को बाहरी परिस्थितियों से अधिक अपने मन को समझने और नियंत्रित करने की आवश्यकता है।

 

 

‘देशी घी भी चाहिए और उधार भी’—मन की चाहत पर सुनाया रोचक प्रसंग

 

आचार्य श्री ने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि दो मित्र एक प्रसिद्ध रेस्टोरेंट में भोजन करने पहुंचे। प्रवेश द्वार पर लिखा था—“हिंदुस्तानी भोजन करना है तो दाएं मुड़िए और चाइनीज भोजन करना है तो बाएं मुड़िए।”

दोनों ने सोचा कि हिंदुस्तानी भोजन तो रोज करते हैं, आज चाइनीज भोजन किया जाए और वे बाईं ओर मुड़ गए।

आगे एक और दरवाजा आया, जिस पर लिखा था—“डालडा का खाना है तो दाएं मुड़िए और देशी घी का खाना है तो बाएं मुड़िए।” दोनों ने सोचा कि जब यहां तक आ ही गए हैं तो डालडा क्यों खाएं, आज तो शुद्ध देशी घी का भोजन करेंगे। वे फिर बाईं ओर मुड़ गए।

इसके बाद एक और दरवाजा आया, जिस पर लिखा था—“नगद खाना है तो दाएं मुड़िए और उधार खाना है तो बाएं मुड़िए।” दोनों मित्र खुशी से बोले—“मजा आ गया! शुद्ध देशी घी का भोजन और वह भी उधार में—इससे अच्छा और क्या हो सकता है?”

वे झट से बाईं ओर मुड़े, लेकिन जैसे ही आगे बढ़े तो खुद को होटल के बाहर सड़क पर खड़ा पाया। सामने लिखा था—“अरे मूर्ख! इधर-उधर क्या देखते हो? यहां तुम्हारे जैसे बेवकूफ और मुफ्तखोरों के लिए कोई जगह नहीं है।”

आचार्य श्री ने इस प्रसंग के माध्यम से मनुष्य के मन की प्रवृत्ति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारा मन भी अक्सर ऐसा ही चाहता है—सुख-सुविधाएं भरपूर मिलें, लेकिन उसकी कीमत हमें न चुकानी पड़े। जबकि जीवन का नियम स्पष्ट है कि यदि देशी घी का भोजन करना है तो उसकी कीमत भी चुकानी होगी।

उन्होंने कहा कि जीवन में बिना मूल्य चुकाए श्रेष्ठ परिणाम की अपेक्षा करना उचित नहीं है। सफलता के लिए परिश्रम, आत्मकल्याण के लिए संयम और सम्मान के लिए विनय आवश्यक है। मनुष्य को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हुए कर्म और पुरुषार्थ के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।

प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में गुरु भक्त उपस्थित रहे और आचार्य श्री के संदेश को श्रद्धापूर्वक सुना।

प्रचार-प्रसार संयोजक: नरेंद्र अजमेरा एवं पियुष कासलीवाल, औरंगाबाद
जानकारी संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो.: 9929747312

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