शरीर और आत्मा अलग हैं, आसक्ति ही सुख-दुःख का मूल कारण : स्वस्तिभूषण माताजी
केशवरायपाटन।
मनुष्य जिस दिन अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है, उसी दिन वह बाहरी वस्तुओं के मोह और आसक्ति से ऊपर उठने की दिशा में आगे बढ़ने लगता है। आत्मा और शरीर का भेद समझना ही आत्मकल्याण की पहली सीढ़ी है। यह उद्बोधन भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने शनिवार को अतिशय क्षेत्र में आयोजित धर्मसभा में दिया।
आर्यिका माताजी ने दूध और पानी का उदाहरण देते हुए कहा कि दूध में पानी मिल जाने पर दूध पतला हो जाता है, लेकिन पानी के गुण कभी दूध के समान नहीं हो सकते। दोनों के गुण और स्वभाव अलग हैं। इसी प्रकार आत्मा और शरीर साथ दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तव में दोनों का स्वरूप अलग है। शरीर पुद्गल है, जबकि आत्मा चेतन सत्ता है।
उन्होंने कहा कि जब तक आत्मा शरीर में रहती है, तब तक शरीर को होने वाले सुख-दुःख का अनुभव होता है। मृत्यु के बाद आत्मा शरीर से अलग हो जाती है और वही शरीर सामने पड़ा रहता है, लेकिन उसे किसी प्रकार के सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता। इससे स्पष्ट है कि सुख-दुःख का अनुभव करने वाली सत्ता शरीर नहीं, बल्कि आत्मा है।
माताजी ने कहा कि संसार में मनुष्य के सुख और दुःख का बड़ा कारण बाहरी वस्तुएं नहीं, बल्कि उन वस्तुओं के प्रति हमारी आसक्ति और अटैचमेंट है। जिस वस्तु के प्रति जितना अधिक लगाव होगा, उसके मिलने पर उतना ही अधिक सुख और उससे दूर होने पर उतना ही अधिक दुःख अनुभव होगा।
उन्होंने कहा कि वस्तुओं के प्रति आसक्ति कम होने लगे तो सुख-दुःख की अनुभूति भी धीरे-धीरे कम होने लगती है। इसलिए आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानते हुए मोह और आसक्ति से ऊपर उठना ही आत्मिक शांति और आत्मकल्याण का मार्ग है।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312





