अष्ट मद का त्याग आत्मकल्याण का मार्ग, अहंकार गिराता है और विनय आत्मा को उठाता है : मुनिश्री योगसागर जी

धर्म

अष्ट मद का त्याग आत्मकल्याण का मार्ग, अहंकार गिराता है और विनय आत्मा को उठाता है : मुनिश्री योगसागर जी

ज्ञान, धन, कुल, रूप, तप और शक्ति का अभिमान नहीं, विनय व सदुपयोग ही जीवन की सच्ची शोभा

कोटा, 22 अगस्त।

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 25 में वर्णित अष्ट मद की मार्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि मनुष्य के आध्यात्मिक पतन का सबसे बड़ा कारण अहंकार है।

 

मुनिश्री ने कहा कि जब व्यक्ति अपने ज्ञान, धन, कुल, रूप, बल, तप या प्रतिष्ठा का अभिमान करने लगता है, तब उसके भीतर से विनय समाप्त होने लगती है। यही अहंकार धीरे-धीरे मनुष्य को धर्म के वास्तविक स्वरूप और आत्मकल्याण के मार्ग से दूर कर देता है।

🌸 अष्ट मद आत्मकल्याण में बनते हैं बाधक

उपलब्धियां पुण्य का परिणाम हैं, अहंकार का कारण नहीं

मुनिश्री योगसागर जी महाराज ने अष्ट मद की व्याख्या करते हुए बताया कि जाति, कुल, रूप, ज्ञान, तप, बल, ऐश्वर्य और धन आदि का अभिमान जीव को मदांध बना देता है। इन उपलब्धियों को स्थायी अपना स्वत्व मान लेना अज्ञानता है, क्योंकि संसार की प्रत्येक वस्तु अनित्य है और पुण्य के क्षीण होते ही परिस्थितियां बदल सकती हैं।

उन्होंने कहा कि जिस गुण से व्यक्ति में विनय और सद्भाव उत्पन्न होना चाहिए, वही गुण यदि अहंकार का कारण बन जाए तो वह आत्मकल्याण में बाधक बन जाता है।

धन मिला है तो उसका सदुपयोग हो, ज्ञान मिला है तो उससे विनय बढ़े, शक्ति मिली है तो उससे दूसरों की रक्षा हो और प्रतिष्ठा मिली है तो उसमें सेवा व धर्मभाव जुड़ा रहे—तभी उपलब्धियों की वास्तविक सार्थकता है।

🪷 अहंकार ने मिटाया धन-वैभव और वंश

बाहरी उपलब्धियां क्षणभंगुर, विनय और संयम ही आत्मा के वास्तविक आभूषण

मुख्य संयोजक श्री हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि मुनिश्री ने धर्मसभा में कहा कि अहंकार मनुष्य को दूसरों से दूर करता है, जबकि विनय आत्मा को ऊंचा उठाता है।

इसलिए जीवन में अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के बजाय आत्मा की शुद्धता और सद्गुणों की वृद्धि का प्रयास करना चाहिए। संसार की बाहरी उपलब्धियां क्षणभंगुर हैं, जबकि विनय, संयम, क्षमा और सम्यग्दर्शन आत्मकल्याण की दिशा में ले जाने वाले वास्तविक आभूषण हैं।

🌺 उपलब्धियों पर गर्व नहीं, सदुपयोग ही सच्चा धर्म

अष्ट मद का त्याग आत्मा को विनय, विवेक और धर्म से जोड़ता है

मुनिश्री ने कहा कि अष्ट मद का त्याग केवल अहंकार छोड़ने का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्मा को विनय, विवेक और धर्म से जोड़ने की साधना है।

जो व्यक्ति अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने के बजाय उन्हें पुण्य का परिणाम मानकर धर्म, समाज और परोपकार के कार्यों में लगाता है, उसका जीवन ही वास्तव में सार्थक बनता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को सदैव स्मरण रखना चाहिए कि संसार में प्राप्त कोई भी उपलब्धि स्थायी नहीं है। इसलिए उपलब्धियों का प्रदर्शन करने के बजाय उनका उपयोग आत्मकल्याण, परोपकार और धर्मप्रभावना में करना चाहिए।

🌼 मुनिश्री का अमृत संदेश

«“मद मनुष्य को नीचे की ओर गिराता है और विनय आत्मा को ऊपर उठाता है।”»

उपलब्धियों का अभिमान नहीं, उनका सदुपयोग ही सच्चे धर्म की पहचान है।

जहां विनय है, वहां विवेक है।

जहां विवेक है, वहां संयम है।

जहां संयम है, वहीं आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

🌸 धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने किया पुण्यार्जन

विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक प्राप्त किया पुण्यलाभ

अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि कलश स्थापना का पुण्यार्जन श्री रमेश जी, अशोक जी, महेन्द्र जी, गीता जी, संदेश जी, साक्षी जी, तन्मय जी, पूजा जी, पंकज जी, चिराग जी, आशीष जी, राहुल जी, विभांश जी, रूबी जी, राही जी, हिमांक जी, जूही जी एवं समस्त जैन धनोप्या परिवार, आवां वाले, दादाबाड़ी, कोटा द्वारा सुपुत्री राही जैन के जन्मदिन के उपलक्ष्य में श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि जैनेश्वरी मुनि दीक्षा के सानंद संपन्न होने के उपलक्ष्य में आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री संदीप जी, श्रीमती रीना जी, भव्य जी, नव्या जी, मिलन जी एवं समस्त जैन परिवार, श्यामली (उत्तर प्रदेश) द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।

शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन ब्रह्मचारिणी अनामिका दीदी एवं ब्रह्मचारिणी रिचा दीदी परिवार द्वारा किया गया।

उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्रीमती अंजना जी, अंकित जी, आशीष जी, प्रियंका जी, रोहित जी, लविश जी एवं समस्त धनोत्या परिवार, बिजोलिया वाले, दादाबाड़ी, कोटा द्वारा चि. लविश के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

इसी क्रम में श्री संदीप जी, श्रीमती रीना जी, भव्य जी, नव्या जी, मिलन जी एवं समस्त जैन परिवार, श्यामली (उत्तर प्रदेश) द्वारा भी श्रद्धापूर्वक पुण्यार्जन किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन पुण्योदय भक्तामर मंडल द्वारा प्राप्त किया गया।

श्री अर्पित एवं श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री सोहनलाल जी, श्री सुरेश जी, किराना वाले, छावनी परिवार को प्राप्त हुआ।

वहीं मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री अजित जी, श्रीमती नीलू जी, डॉ. अशोक जी, श्रीमती रजनी जी ‘सिंघई’, सलोटा, कुंभराज परिवार को प्राप्त हुआ।

मंगलाचरण का पुण्य अवसर श्रीमती साक्षी जैन द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

🪷 गुरुवाणी का सार

“अहंकार उपलब्धियों को बोझ बना देता है, जबकि विनय उन्हीं उपलब्धियों को आत्मकल्याण का साधन बना देता है।”

– जाति का मद छोड़ें — विनय अपनाएं।

– कुल का मद छोड़ें — संस्कार अपनाएं।

– रूप का मद छोड़ें — सद्गुण अपनाएं।

– ज्ञान का मद छोड़ें — विवेक अपनाएं।

– तप का मद छोड़ें — आत्मशुद्धि अपनाएं।

– बल का मद छोड़ें — सेवा अपनाएं।

– ऐश्वर्य और धन का मद छोड़ें — धर्म एवं परोपकार अपनाएं।

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी

मो. 9929747312

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