भगवान की दिव्य वाणी और सत्य के मार्ग से जोड़ता है श्रुत ज्ञान, स्वस्तिभूषण माताजी
केशवरायपाटन के अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा
केशवरायपाटन।
श्रुत ज्ञान केवल सुनने का नाम नहीं है, बल्कि सुनकर उसे समझना, आत्मसात करना और अपने जीवन में उतारना ही श्रुत ज्ञान की वास्तविक सार्थकता है। यह विचार आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी ने सोमवार को केशवरायपाटन स्थित अतिशय क्षेत्र में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
माताजी ने कहा कि जैन दर्शन में श्रुत ज्ञान का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यही ज्ञान मनुष्य को भगवान की वाणी, सत्य और आत्मकल्याण के मार्ग से जोड़ता है। उन्होंने कहा कि संसार में ऐसे अनेक शब्द और ज्ञान के स्वरूप हैं, जिन्हें हमने शायद कभी सुना भी नहीं, लेकिन सुनने के माध्यम से प्राप्त होने वाला ज्ञान ही श्रुत ज्ञान कहलाता है।
गणधर स्वामियों की अद्भुत स्मरण शक्ति का किया वर्णन
आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी ने भगवान महावीर स्वामी की दिव्य वाणी और गणधर स्वामियों की विलक्षण क्षमताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान की दिव्य ध्वनि को गणधर स्वामी सुनते थे और उसी क्षण उसे धारण कर लेते थे। उनके पास अद्भुत रिद्धियां एवं असाधारण स्मरण शक्ति थी।
उन्होंने कोष्ठ बुद्धि रिद्धि का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार कोठार में कितना भी अनाज भरते जाएं, वह निरंतर समाहित होता जाता है, उसी प्रकार गणधर स्वामी भगवान की दिव्य वाणी को अपने ज्ञान में धारण करते जाते थे।
इसी प्रकार पदानुसारी रिद्धि की विशेषता बताते हुए उन्होंने कहा कि एक पद पढ़ने मात्र से संपूर्ण शास्त्र का ज्ञान हो जाना इसकी विलक्षणता है। वहीं संभिन्न स्रोत रिद्धि के माध्यम से एक साथ अनेक व्यक्तियों की अलग-अलग बातों को सुनकर उनका ज्ञान ग्रहण किया जा सकता था।
योग्य गणधर के माध्यम से ही प्रकट होती है दिव्य ध्वनि
माताजी ने कहा कि जिस प्रकार सिंहनी का दूध केवल स्वर्ण पात्र में ही ठहरता है, उसी प्रकार तीर्थंकर भगवान की दिव्य वाणी को ग्रहण करने के लिए योग्य गणधर आवश्यक होते हैं। जब तक भगवान के समवशरण में गणधर उपस्थित नहीं होते, तब तक उनकी दिव्य ध्वनि नहीं खिरती।
उन्होंने भगवान महावीर स्वामी के केवलज्ञान प्राप्ति के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद भी 66 दिनों तक भगवान महावीर स्वामी की दिव्य वाणी नहीं खिरी, क्योंकि उस समय तक योग्य गणधर उपस्थित नहीं थे।
धर्मसभा में माताजी के प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को श्रुत ज्ञान के महत्व को समझने और उसे केवल सुनने तक सीमित न रखकर अपने आचरण एवं जीवन में उतारने की प्रेरणा दी।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
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