आत्मा को पापों से स्वतंत्र करना ही सच्ची स्वतंत्रता : आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज
स्वतंत्रता दिवस पर धर्मसभा में आत्मशुद्धि, अहिंसा, ध्यान और मोक्षमार्ग का दिया संदेश — ‘जय भारत, वंदे भरतेश्वरम्’ का जयघोष हुआ सार्थक
बड़ौत।
स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर बड़ौत स्थित जैन मंदिर में विराजमान आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि देश को पराधीनता से मुक्ति मिलना स्वतंत्रता का एक स्वरूप है, लेकिन आत्मा को राग-द्वेष, मोह और पाप कर्मों के बंधनों से मुक्त करना ही वास्तविक और सच्ची स्वतंत्रता है।
आचार्य श्री ने कहा कि आत्मा अनादिकाल से राग और द्वेष के बंधनों में बंधी हुई है। इन बंधनों को तोड़ने के लिए योग, ध्यान, संयम और धर्म का आश्रय आवश्यक है। जब ध्यान सम्यक दिशा में होता है, तब वह आत्मा को राग-द्वेष से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाता है।
उन्होंने कहा कि संसार में नया कुछ नहीं है। जीव अनंत बार संसार के भोगों को भोग चुका है और उन्हें छोड़ चुका है, लेकिन सच्चे और शाश्वत सुख का अनुभव अभी तक नहीं किया। इसलिए अब आवश्यकता है कि हम उसी शाश्वत सुख की खोज करें और अपनी आत्मा को पापों से स्वतंत्र कर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ें।
‘वंदे भरतेश्वरम्’ से किया भरत परमेश्वर का स्मरण
आचार्य श्री ने स्वतंत्रता दिवस के संदर्भ में भगवान ऋषभदेव और उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती का स्मरण करते हुए कहा कि जैन परंपरा में वर्णित भरत परमेश्वर ने सांसारिक वैभव के बाद मुनिदीक्षा धारण की और साधना के माध्यम से अरिहंत-केवली भगवान बनकर मोक्ष प्राप्त किया।
उन्होंने कहा कि भरत के नाम से ही इस देश का नाम भारत पड़ा। ऐसे भरत परमेश्वर को आज के पावन दिन हम ‘वंदे भरतेश्वरम्’ कहकर श्रद्धापूर्वक नमन करें और विश्वशांति की मंगलकामना करें।
आचार्य श्री ने कहा कि “जय भारत… वंदे भरतेश्वरम्” का जयघोष तभी सार्थक होगा, जब हम बाहरी स्वतंत्रता के साथ अपनी आत्मा को भी विकारों और बंधनों से मुक्त करने का संकल्प लें।
‘स्वतंत्र होना सीख लो’ — कविता के माध्यम से दिया संदेश
धर्मसभा के अंत में आचार्य श्री ने अपनी भावपूर्ण कविता ‘स्वतंत्र होना सीख लो’ के माध्यम से अहिंसा, नीति, दान, त्याग, ध्यान, सादगी और मोक्षमार्ग का संदेश दिया।
उन्होंने कहा—
«अधर्म रूप हिंसा तज, धर्म करना सीख लो,
नहीं सुख है बंधन में, स्वतंत्र होना सीख लो।»
उन्होंने अनीति छोड़कर नीति से धन कमाने, धोखे के स्थान पर न्याय अपनाने, धन संग्रह के बजाय दान करने, हिंसा और पशुहत्या से दूर रहने, राग-मोह त्यागकर संयम अपनाने तथा परिग्रह छोड़कर चिंता से मुक्त होने का आह्वान किया।
आचार्य श्री ने कहा कि क्रोध मनुष्य को अशांत करता है, इसलिए ध्यान को सुख का साधन बनाकर शांति की ओर बढ़ना चाहिए। सादा जीवन, करुणा, प्रेम और जरूरतमंदों के प्रति संवेदना ही मनुष्य को वास्तविक सुख की ओर ले जाती है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि स्वतंत्रता दिवस केवल देश की स्वतंत्रता का उत्सव मनाने तक सीमित न रहे, बल्कि आत्मा को पापों से स्वतंत्र करने का संकल्प दिवस भी बने।
सच्ची स्वतंत्रता वही है, जिसमें आत्मा राग-द्वेष और कर्मबंधनों से मुक्त होकर शाश्वत सुख एवं मोक्ष की ओर अग्रसर हो।
संघस्थ ब्रह्मचारी ऋषिका दीदी से प्राप्त जानकारी
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312








