समय मूल रूप से अखंड है, इंसान ने सुविधा के लिए इसे बांटा : स्वस्तिभूषण माताजी
केशवरायपाटन।
श्री मुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र में बुधवार को आयोजित धर्मसभा में भारत गौरव गणिनी संस्कार ही जीवन की असली पूंजी 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने समय और ज्ञान के गूढ़ स्वरूप पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि समय और ज्ञान मूल रूप से अखंड हैं, मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए इन्हें अलग-अलग भागों में बांट दिया है।
संस्कार ही जीवन की असली पूंजी
माताजी ने संस्कारों को जीवन की सबसे बड़ी पूंजी बताते हुए कहा कि अच्छे संस्कार केवल उपदेश देने से नहीं आते, बल्कि परिवार के व्यवहार और दैनिक आचरण से बच्चों के भीतर विकसित होते हैं। बच्चों में बचपन से ही अनुशासन, बड़ों के प्रति सम्मान और अच्छे व्यवहार की भावना विकसित करना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि बच्चे सुनने से अधिक देखकर सीखते हैं। ऐसे में माता-पिता और शिक्षकों का आचरण स्वयं आदर्श होना चाहिए। आधुनिक और तकनीकी युग में संस्कारों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। संस्कारवान व्यक्ति ही समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।
चार चरणों में विकसित होता है मतिज्ञान
धर्मसभा में माताजी ने तत्त्वार्थ सूत्र के सूत्र “तदिन्द्रियानिन्द्रिय निमित्तम्” का अर्थ समझाते हुए कहा कि इंद्रिय और मन की सहायता से मतिज्ञान की प्राप्ति होती है। उन्होंने मतिज्ञान के चार भेद अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा बताए।
– अवग्रह — वस्तु का सामान्य ज्ञान होना।
– ईहा — उसके बारे में विशेष रूप से जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होना।
– अवाय — विचार और लक्षणों के आधार पर निश्चित निर्णय तक पहुंचना।
– धारणा — प्राप्त ज्ञान को लंबे समय तक स्मरण में बनाए रखना।
माताजी ने कहा कि ज्ञान के विकास की इस प्रक्रिया को समझने से यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य के जीवन में ज्ञान एक क्रम के अनुसार विकसित होता है। सही ज्ञान के साथ संस्कार जुड़ जाएं तो व्यक्ति न केवल स्वयं के जीवन को सार्थक बनाता है, बल्कि समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312




