जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है… लेकिन जवानी को दिशा कौन देगा?

धर्म

जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है… लेकिन जवानी को दिशा कौन देगा?

किसी भाई ने एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें बड़े दमदार बोल थे—

“जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है।”

सत प्रतिशत सही बात है… क्योंकि युवा केवल उम्र का नाम नहीं, वह ऊर्जा है, उत्साह है, सामर्थ्य है और आने वाले कल की तस्वीर है। लेकिन सिक्के के दो पहलू होते हैं और जब तक दोनों पहलू मौजूद न हों, सिक्का अधूरा ही नहीं, खोटा भी माना जाता है।

 

इसलिए इस कथन का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है—

जवानी चले तो सही, लेकिन सही दिशा में चले… और सही दिशा दिखाने वाला कोई श्रेष्ठ मार्गदर्शक, कोई निष्पृह गुरु भी साथ हो।

 

क्योंकि ऊर्जा अपने आप में पर्याप्त नहीं होती, ऊर्जा को दिशा चाहिए।

युवा के कदमों में गति हो सकती है, लेकिन मंजिल का ज्ञान किसी अनुभवी पथप्रदर्शक से ही मिलता है। गुरु वह होता है जो केवल यह नहीं बताता कि “कहाँ जाना है”, बल्कि यह भी सिखाता है कि “किस रास्ते से जाना है, रास्ते की कठिनाइयों में कैसे टिके रहना है और मंजिल तक पहुँचकर अहंकार में कैसे नहीं बहकना है।”

 

कल इंदौर के छत्रपति नगर, दलालबाग में निर्यापक श्रेष्ठ श्रमण मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के श्री सान्निध्य में आयोजित युवा सम्मेलन में युवाओं का उत्साह देखकर मन सचमुच आनंद से भर गया।

 

यह दृश्य केवल भीड़ का दृश्य नहीं था…

यह दिशा बदलती हुई पीढ़ी का दृश्य था।

 

जिन युवाओं के कदम कभी अपनी मर्जी से संसार की चमक-दमक की ओर बढ़ रहे थे, उन्हीं कदमों को धर्म का सहारा देकर सद्मार्ग की ओर मोड़ने का सामर्थ्य विरले संतों में ही होता है। और जब सामने सुधासागर जैसे गुरु हों, तो युवा केवल मंदिर तक नहीं पहुँचता—वह धीरे-धीरे अपने भीतर के मंदिर तक पहुँचने की यात्रा भी शुरू कर देता है।

 

मेरा अनुभव तो यह कहता है कि किसी राजा के दरबार से वैभव प्राप्त करने वाले बालक से कहीं अधिक भाग्यशाली वह बालक है, जिसे किसी श्रेष्ठ साधक के चरणों में बैठकर ज्ञान, संस्कार और जीवन की सही दिशा प्राप्त हो जाए।

 

इतिहास में इसका सबसे बड़ा उदाहरण चन्द्रगुप्त मौर्य और आचार्य चाणक्य हैं। चन्द्रगुप्त में प्रतिभा थी, सामर्थ्य था, लेकिन उस सामर्थ्य को साम्राज्य की ऊँचाइयों तक पहुँचाने वाली शिक्षा, रणनीति और संस्कार चाणक्य ने दिए। गुरु की दृष्टि ने शिष्य की संभावनाओं को पहचाना और फिर वही शिष्य इतिहास का ऐसा अध्याय बना, जिसे सदियों बाद भी दुनिया पढ़ती है।

 

और यहां एक बात पूरे विश्वास से कही जा सकती है कि सुधासागर जी महाराज को गढ़ने वाले उनके गुरु भी साधारण प्रतिभा के धनी नहीं थे। उन्होंने अपने शिष्य को केवल शब्द नहीं दिए, जीवन दिया; केवल उपदेश नहीं दिए, साधना की दृष्टि दी; केवल ज्ञान नहीं दिया, उसे आचरण में उतारने की शक्ति दी।

 

शायद यही कारण है कि आज सुधासागर जी महाराज के सान्निध्य में आने वाला युवा केवल प्रभावित होकर लौटता नहीं, बल्कि परिवर्तन की संभावना लेकर लौटता है।

 

आज मंदिरों में युवाओं की बढ़ती उपस्थिति को केवल भीड़ मत समझिए।

यह उस संस्कार-यात्रा का परिणाम है जिसमें किसी संत ने युवाओं की ऊर्जा को भटकने से बचाकर भक्ति, संयम, संस्कार और धर्म की दिशा देने का प्रयास किया है।

 

और मेरी इच्छा तो यही है कि संसार में जितने भी श्रेष्ठ साधक अपनी साधना और पुरुषार्थ से धर्म को प्रतिष्ठित करने में लगे हैं, वे सभी किसी एक मंच, किसी एक नाम या किसी एक प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य के लिए मिलकर प्रयास करें।

 

क्योंकि युवा किसी एक व्यक्ति की संपत्ति नहीं है।

युवा समाज की शक्ति है, धर्म का भविष्य है और राष्ट्र की दिशा है।

 

उसे जोड़िए…

उसे समझाइए…

उसे संस्कार दीजिए…

उसे साधना का स्वाद चखाइए।

 

और सबसे बड़ी बात—उसे एक-दूसरे से आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा नहीं, स्वयं से आगे निकलने की प्रेरणा दीजिए।

 

किसी के प्रति राग नहीं, किसी के प्रति द्वेष नहीं, किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं—निस्पृह भाव से दिया गया एक अक्षर भी कभी-कभी जीवन का मंत्र बन जाता है। वही एक शब्द किसी के जीवन की दिशा बदल सकता है, किसी भटके कदम को रोक सकता है और किसी युवा को उस ऊँचाई तक पहुँचा सकता है, जहाँ पहुँचने के लिए संसार जीवन भर तड़पता रहता है।

 

इसलिए गुरु चुनना हो तो ऐसा चुनिए जो आपको अपने पीछे चलने के लिए मजबूर न करे, बल्कि आपको स्वयं के भीतर देखने की दृष्टि दे।

 

ऐसा गुरु चुनिए जिसके पास देने के लिए पद नहीं,

पथ हो।

 

जिसके पास मांगने के लिए कुछ नहीं,

केवल देने की करुणा हो।

 

जिसके भीतर राग-द्वेष नहीं,

निष्पृहता हो।

 

और जिसके चरणों में बैठकर युवा यह सीख सके कि—

जवानी केवल जिंदगी जीने के लिए नहीं मिली,

जवानी जिंदगी को सार्थक बनाने के लिए मिली है।

 

ऐसे ही संतों का सान्निध्य मिले, ऐसी ही गुरु-दृष्टि मिले और युवाओं की यही ऊर्जा धर्म की ओर बढ़ती रहे—तो वह दिन दूर नहीं जब मंदिरों में युवाओं की भीड़ केवल दिखाई नहीं देगी, बल्कि युवाओं के आचरण में धर्म दिखाई देगा।

 

क्योंकि जिस ओर सही दिशा में चलती हुई जवानी जाती है,

उस ओर केवल जमाना ही नहीं चलता…

एक नई पीढ़ी का भविष्य चलता है। 🙏🚩

 

#श्रीश ललितपुर

 

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