व्यवहार शुद्धि का मूल मंत्र है विनम्रता, केवल चरण स्पर्श नहीं: राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज
राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने श्री सम्मेद शिखर में कहा कि विनम्रता केवल चरण स्पर्श नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान, सहनशीलता और संस्कारित व्यवहार का नाम है। जानिए उनके प्रेरक जीवन सूत्र।
गिरीडीह (श्री सम्मेद शिखर)। व्यवहार की शुद्धि ही व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान है और उसका मूल आधार विनम्रता है। राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने प्रातःकालीन धर्मसभा में कहा कि विनम्रता केवल चरण स्पर्श करने का नाम नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के अस्तित्व, भावनाओं और गरिमा का सम्मान करने का भाव है। उन्होंने कहा कि जब धर्म केवल सुनने तक सीमित न रहकर जीवन में उतरता है, तभी वास्तविक आत्मिक परिवर्तन संभव होता है।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य का जीवन भाव, विचार, भाषा और व्यवहार की शुद्धि से सिद्धि की ओर अग्रसर होता है। मोक्षमार्ग में भाव, विचार और भाषा की शुद्धि के बाद व्यवहार की शुद्धि सबसे महत्वपूर्ण है और उसका मूल आधार विनय है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वास्तविक विनय छोटे-बड़े के भेद से ऊपर उठकर प्रत्येक व्यक्ति के प्रति सम्मानपूर्ण दृष्टि रखने में है। बड़ों का सम्मान और छोटों के प्रति स्नेह—यही श्रेष्ठ व्यवहार की पहचान है।
उन्होंने वर्तमान समाज और परिवारों में बढ़ती दूरियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पीढ़ियों के बीच बढ़ती खाई का प्रमुख कारण व्यवहार की कठोरता और संस्कारों का क्षय है। बच्चे वही सीखते हैं जो अपने माता-पिता के आचरण में देखते हैं। यदि बड़े स्वयं अपने माता-पिता, गुरुजनों और बुजुर्गों का सम्मान करेंगे तो वही संस्कार सहज रूप से अगली पीढ़ी तक पहुँचेंगे। उन्होंने कहा, “बच्चे वह नहीं करते जो आप कहते हैं, बल्कि वही करते हैं जो आप करते हैं।”
मुनिश्री ने कहा कि केवल चरण स्पर्श कर लेना विनय नहीं है। यदि उसके बाद बड़ों की बात काट दी जाए या उनके प्रति असम्मानजनक व्यवहार किया जाए तो वह केवल औपचारिकता है। असहमति भी शालीनता, संयम और सम्मान के साथ व्यक्त की जानी चाहिए। उन्होंने जैन परंपरा के ‘तथाकार’ भाव का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले सामने वाले की बात को स्वीकार करें, फिर विनम्रता के साथ अपना पक्ष रखें। इससे संवाद भी सार्थक बनता है और संबंध भी मधुर बने रहते हैं।
उन्होंने कहा कि बड़ों को भी किसी उचित सुझाव को केवल इसलिए अस्वीकार नहीं करना चाहिए कि वह किसी छोटे ने दिया है। विनम्र व्यक्ति की सोच “मेरा सो खरा” नहीं, बल्कि “खरा सो मेरा” होती है। अहंकार व्यक्ति को अपनी भूल स्वीकारने और दूसरों के गुण अपनाने से रोकता है, जबकि विनम्र व्यक्ति अपनी त्रुटियों को स्वीकार कर निरंतर आत्मविकास करता है।
सहनशीलता को समर्थ व्यक्तित्व का आधार बताते हुए मुनिश्री ने विनम्रता के चार जीवन सूत्र बताए—अहंकार का त्याग, सभी के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार, दूसरों के अच्छे कार्य का श्रेय उन्हें देना तथा अपनी गलती स्वीकार कर आवश्यकता पड़ने पर क्षमा माँगने का साहस रखना। उन्होंने कहा कि यही गुण व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाते हैं और परिवार व समाज में मधुर संबंधों की नींव रखते हैं।
श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए उन्होंने प्रतिदिन यह संकल्प लेने की प्रेरणा दी—”मुझे विनम्र रहना है।” जहाँ भी अहंकार दिखाई दे, वहाँ आत्मचिंतन और प्रतिक्रमण करें तथा संस्कारित और विनम्र लोगों की संगति अपनाएँ। उन्होंने कहा कि आज व्यक्तित्व विकास के लिए अनेक प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं, जबकि हमारे धर्मशास्त्र और गुरुजन सदियों पहले ही जीवन को सफल बनाने के सरल और प्रभावी सूत्र दे चुके हैं।
राष्ट्रीय प्रवक्ता गुणायतन एवं सेवायतन के अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि आज मुनि श्री समादर सागर महाराज ने केशलोंच कर वैराग्य, समता और आत्मबल का प्रेरक संदेश दिया। धर्मसभा में मुनि श्री संधान सागर महाराज, सार सागर महाराज एवं रूप सागर महाराज भी विराजमान रहे। कार्यक्रम का संचालन ब्रह्मचारी अशोक भैया ने किया।
संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312





