“अपने दुख की कहानी अपनों को मत सुनाओ, श्रीराम से सीखें जीवन जीने की कला” — निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव 108 श्री सुधासागर जी महाराज
इंदौर की धर्मसभा में मुनिश्री ने बताया— धर्म का सबसे बड़ा लाभ स्वयं को मिलता है, भय, अहंकार और नकारात्मक सोच से कभी नहीं होता कल्याण।
इंदौर।
निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव, ज्ञानी-ध्यानी 108 श्री सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन प्रबंधन, धर्म, सेवा और आत्मकल्याण के अनेक प्रेरणादायी सूत्र दिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने दुखों की कहानी अपने बड़ों और अपनों को सुनाकर उन्हें दुखी नहीं करना चाहिए। इस संदर्भ में उन्होंने भगवान श्रीराम का उदाहरण देते हुए बताया कि युद्ध के कठिन समय में भी श्रीराम ने अयोध्या में अपने कष्टों का समाचार नहीं भेजा, क्योंकि वे अपने प्रियजनों को व्यर्थ की पीड़ा नहीं देना चाहते थे।
धर्म का लाभ सबसे पहले स्वयं को मिलता है
मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति जिस कार्य में मन लगाता है, वास्तविक लाभ भी उसी में प्राप्त होता है। धर्मकार्य ऐसा क्षेत्र है, जहाँ सबसे पहले स्वयं का कल्याण होता है। गुरु की सेवा, दान, मंदिर निर्माण और धर्म प्रचार का सबसे बड़ा फल सेवा करने वाले को मिलता है, न कि गुरु या भगवान को।
प्रवचन सुनना लाभ का, सुनाना त्याग का कार्य
उन्होंने कहा कि मुनिराज को आहार कराने का पुण्य गृहस्थ को मिलता है। इसी प्रकार प्रवचन सुनना आत्मकल्याण का माध्यम है, जबकि प्रवचन देना त्याग और तप का मार्ग है। मंदिर भगवान के लिए नहीं, बल्कि भक्तों के आध्यात्मिक उत्थान के लिए बनते हैं।
दूसरे का बुरा सोचने से पहले स्वयं का नुकसान होता है
मुनिश्री ने कहा कि जो व्यक्ति दूसरों का अहित चाहता है, वह सबसे पहले अपना ही अहित करता है। किसी का मुंह काला करने से पहले अपने हाथ काले करने पड़ते हैं। इसलिए द्वेष, ईर्ष्या और भय से मुक्त होकर सकारात्मक जीवन जीना ही सच्चा धर्म है।
डर समाप्त होगा तो जीवन बदल जाएगा
उन्होंने कहा कि जिस दिन मनुष्य यह संकल्प कर ले कि वह किसी का अहित नहीं करेगा, उसी दिन से उसका भय समाप्त हो जाएगा। भयमुक्त जीवन ही आत्मकल्याण की पहली सीढ़ी है।
दुख के दिनों में भी मुस्कुराना सीखें
मुनिश्री ने कहा कि दुख के समय रोने के बजाय प्रसन्न रहना चाहिए। यदि दुख के दिनों में भी दूसरों के बीच मिठाई बांटकर सकारात्मकता फैलाएंगे तो दुख का प्रभाव कम होगा। उपवास का उद्देश्य भी यही है कि अभाव में भी आनंद का अनुभव किया जाए।
स्वयं को दोषी मानने से शुरू होता है पुण्य
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि “मैं अधर्मी हूं, मुझे धर्मात्मा बनना है”, तभी उसके जीवन में वास्तविक परिवर्तन प्रारंभ होता है। अहंकार ही पतन का सबसे बड़ा कारण है।
राम और रावण में यही था सबसे बड़ा अंतर
मुनिश्री ने कहा कि रावण भगवान के दर्शन किए बिना भोजन नहीं करता था, फिर भी उसका पतन हुआ क्योंकि उसने कभी अपने दोष स्वीकार नहीं किए। दूसरी ओर भगवान श्रीराम ने सदैव विनम्रता और आत्मस्वीकृति का मार्ग अपनाया। यही दोनों के जीवन का सबसे बड़ा अंतर है।
भगवान के सामने दुख नहीं, कृतज्ञता रखें
उन्होंने कहा कि भगवान को हमारे दुख बताने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे सब जानते हैं। उनके सामने केवल कृतज्ञता और धन्यवाद का भाव रखना चाहिए। जो व्यक्ति ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करता है, उसके जीवन में सुख और शांति स्वतः बढ़ने लगती है।
मुनिश्री के प्रेरणादायी उद्बोधन ने उपस्थित श्रद्धालुओं को धर्म, सेवा, सकारात्मक सोच और आत्मचिंतन का संदेश दिया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने उनके अमूल्य वचनों को आत्मसात करने का संकल्प लिया।
संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी। 9929747312




