“आत्मविस्मृति ही जीवन की सबसे बड़ी हानि, भगवान की वाणी से करें आत्मस्वरूप की पहचान” — मुनि श्री निर्णय सागर महाराज
: विदिशा में धर्मसभा में आत्मकल्याण, संयम और कर्म सिद्धांत पर दिया गहन संदेश, 9 अगस्त को शीतलधाम में चातुर्मास कलश स्थापना का होगा भव्य आयोजन
विदिशा।
संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव 108 विद्यासागरजी महामुनिराज के परम शिष्य एवं आचार्य श्री 108 समयसागर महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य, पाठशाला प्रणेता मुनि श्री 108 निर्णय सागर महाराज ने धर्मसभा एवं शंका-समाधान कार्यक्रम में आत्मचिंतन का अमूल्य संदेश देते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी हानि धन, वैभव या भौतिक वस्तुओं का नष्ट होना नहीं, बल्कि अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को भूल जाना है। भगवान की वाणी को समझकर ही आत्मा की पहचान संभव है और यही मोक्षमार्ग की प्रथम सीढ़ी है।
मुनिश्री ने कहा कि जब किसी व्यक्ति का धन, मोबाइल या कोई कीमती वस्तु खो जाती है, तो वह उसे पाने के लिए हर संभव प्रयास करता है। लेकिन जब मनुष्य अपने आत्मज्ञान, अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य और आत्मस्वरूप से दूर हो जाता है, तब उसे इसका अहसास तक नहीं होता। वास्तव में सबसे बड़ा दुर्भाग्य आत्मविस्मृति है। जो स्वयं को पहचान लेता है, उसके जीवन में समता, शांति, विवेक और सही दिशा का उदय होता है।
उन्होंने कहा कि शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा शाश्वत है। इसलिए जीवन का लक्ष्य केवल सांसारिक उपलब्धियाँ अर्जित करना नहीं, बल्कि आत्मकल्याण होना चाहिए। मृत्यु के समय धन, परिवार, शरीर अथवा कोई भी भौतिक साधन साथ नहीं जाता, केवल अपने कर्म ही जीव के साथ चलते हैं। इसलिए समाधि-मरण की तैयारी अंतिम समय में नहीं, बल्कि पूरे जीवन में संयम, स्वाध्याय, आत्मचिंतन और धर्मसाधना के माध्यम से करनी चाहिए। बाहरी आडंबर से कहीं अधिक महत्व अंतःकरण की निर्मलता और आत्मस्मृति का है।
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि केवल भगवान बनने की कल्पना करने से कुछ नहीं होगा। पहले भगवान की वाणी, उनके उपदेश और उनके आदर्श जीवन को समझना आवश्यक है। तीर्थंकर भगवान किसी के भाग्य-विधाता नहीं, बल्कि कर्मों पर विजय प्राप्त करने का मार्ग दिखाने वाले वीतराग महापुरुष हैं। प्रत्येक जीव अपने कर्मों का स्वयं कर्ता और भोक्ता है। इसलिए भगवान की सच्ची आराधना उनके गुणों को अपने जीवन में उतारने में ही निहित है।
इस अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज एवं श्री शीतल विहार न्यास के प्रचारमंत्री अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ तथा अशोक सिंघई ‘गुड्डू’ ने बताया कि मुनिश्री के प्रेरणादायी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8:15 बजे श्री शांतिनाथ जिनालय (स्टेशन जैन मंदिर), विदिशा में आयोजित हो रहे हैं, जिनका बड़ी संख्या में श्रद्धालु लाभ ले रहे हैं।
उन्होंने जानकारी दी कि 9 अगस्त (रविवार) दोपहर 1 बजे शीतलधाम, विदिशा में चातुर्मास कलश स्थापना समारोह संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव 108 विद्यासागरजी महामुनिराज के परोक्ष एवं आचार्य श्री 108 समयसागर महाराज के प्रत्यक्ष आशीर्वाद से, पाठशाला प्रणेता मुनि श्री 108 निर्णय सागर महाराज एवं क्षुल्लक श्री तत्त्वसागर महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ सम्पन्न होगा।
चातुर्मास समिति, सकल दिगंबर जैन समाज एवं श्री शीतल विहार न्यास ट्रस्ट द्वारा आयोजन की व्यापक तैयारियाँ की जा रही हैं। समिति ने समाज के सभी श्रद्धालुओं से परिवार सहित धर्मसभा में उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त करने तथा इस ऐतिहासिक आयोजन को सफल बनाने का आग्रह किया है।
— संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

