वीतराग मार्ग ही आत्मकल्याण का शाश्वत पथ, भ्रम नहीं सिद्धांतों का करें अनुसरण : निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज
वीर शासन जयंती पर पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसियां जी में उमड़ा आस्था का सैलाब; मुनिश्री बोले— प्रत्येक जीव में भगवान बनने की अनंत क्षमता, सम्यग्दर्शन ही मोक्ष का द्वार
कोटा, 30 जुलाई।
भगवान श्री 1008 महावीर स्वामी की प्रथम दिव्यध्वनि (दिव्य देशना) एवं जिनशासन प्रवर्तन दिवस ‘वीर शासन जयंती’ के पावन अवसर पर श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में भव्य धर्मसभा का आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना के वातावरण में संपन्न हुआ। भगवान महावीर के केवलज्ञान के उपरांत श्रावण कृष्ण प्रतिपदा को प्रकट हुई दिव्य देशना के स्मरण में बड़ी संख्या में श्रद्धालु धर्मसभा में पहुंचे और जिनवाणी, गुरु एवं धर्म के प्रति अपनी अटूट आस्था व्यक्त की।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने कहा कि भगवान महावीर का वीतराग मार्ग ही आत्मकल्याण का शाश्वत मार्ग है। समय और परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन सत्य, धर्म और मोक्षमार्ग के सिद्धांत कभी नहीं बदलते। इसलिए भ्रम, अंधानुकरण और भटकाव से बचते हुए प्रत्येक व्यक्ति को भगवान महावीर द्वारा बताए गए सिद्धांतों का अनुसरण करना चाहिए।

मंदिर के निदेशक हुकम जैन ‘काका’, अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ एवं महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि वीर शासन जयंती पर आयोजित विशेष धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर भगवान महावीर की दिव्य देशना का श्रवण किया और जिनशासन की प्रभावना में अपनी श्रद्धा अर्पित की।
भगवान महावीर की दिव्य देशना आज भी मानवता की पथप्रदर्शक
मुनिश्री ने कहा कि भगवान महावीर की वीतराग वाणी हजारों वर्षों पूर्व जितनी प्रासंगिक थी, आज भी उतनी ही प्रेरणादायी और जीवनोपयोगी है। यदि मानव समाज अहिंसा, अपरिग्रह, करुणा और समता के सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार ले, तो परिवार से लेकर विश्व तक शांति, सद्भाव और सौहार्द की स्थापना संभव है। उन्होंने कहा कि महावीर का शासन किसी एक युग तक सीमित नहीं, बल्कि अनंत काल तक मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा।
हर जीव में भगवान बनने की क्षमता
अपने ओजस्वी प्रवचनों में मुनिश्री ने कहा कि भगवान महावीर कोई अलौकिक अपवाद नहीं थे। उन्होंने तप, त्याग, संयम और आत्मसाधना से कर्मों का क्षय कर सिद्धत्व प्राप्त किया। इसलिए प्रत्येक जीव में भी भगवान बनने की अनंत संभावना विद्यमान है। मोक्ष का कोई नया मार्ग नहीं है, तीर्थंकरों द्वारा प्रतिपादित मार्ग ही आज भी प्रत्येक जीव के लिए समान रूप से उपलब्ध है।
कर्मों का क्षय ही देवाधिदेव बनने का आधार
मुनिश्री ने कर्म सिद्धांत का सरल विवेचन करते हुए कहा कि संसार में मिलने वाले सुख-दुःख, पद, प्रतिष्ठा और परिस्थितियां कर्मों के उदय का परिणाम हैं। पुण्य से देवगति मिल सकती है, लेकिन समस्त कर्मों का पूर्ण क्षय होने पर ही आत्मा देवाधिदेव की अवस्था को प्राप्त करती है। केवल स्वर्ग प्राप्त करना अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर वीतराग अवस्था प्राप्त करना ही जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।
सम्यग्दर्शन बदल देता है जीवन की दिशा
उन्होंने कहा कि अनादिकाल से जीव अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को न पहचान पाने के कारण संसार में भटक रहा है। जब सम्यग्दर्शन और सम्यक्ज्ञान का उदय होता है, तभी जीवन की दिशा बदलती है और आत्मा मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होती है। सही दिशा में चलने वाला यात्री जिस प्रकार अपने गंतव्य तक पहुंचता है, उसी प्रकार सम्यक श्रद्धा और सम्यक ज्ञान से युक्त साधक आत्मकल्याण के लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करता है।
पूजा, अभिषेक और जिनवाणी वंदना से गूंजा नसियां जी परिसर
वीर शासन जयंती पर मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना, अभिषेक, जिनवाणी वंदना एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन हुआ। श्रद्धालुओं ने भगवान महावीर की प्रथम दिव्यध्वनि का स्मरण करते हुए धर्म, संयम और आत्मसाधना के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
समिति अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेन्द्र जी, हुकम जैन ‘काका’, प्रकाश हरसोरा परिवार तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा किया गया। उपाध्यक्ष सुमित जैन ने बताया कि चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन भानु जी, विमला जी, एकता जी, कुनाल जी, भावना जी एवं रक्षित बोरखंडिया परिवार द्वारा संपन्न हुआ। वहीं भक्तामर विधान का पुण्यार्जन पुण्योदय भक्तामर मंडल के सभी सदस्य परिवारों ने प्राप्त किया। मुनिश्री के आहारदान का सौभाग्य संतोष कुमार एवं आशीष जैन हरसोरा परिवार तथा क्षुल्लक श्री संयम सागर जी के आहारदान का सौभाग्य अभय कुमार नगेदा परिवार को प्राप्त हुआ।
गुरुवाणी के प्रमुख संदेश
– भगवान महावीर का वीतराग मार्ग ही आत्मकल्याण का शाश्वत मार्ग है।
– सत्य और धर्म के सिद्धांत कभी नहीं बदलते।
– प्रत्येक जीव में भगवान बनने की अनंत क्षमता विद्यमान है।
– कर्मों का पूर्ण क्षय ही सिद्धत्व और मोक्ष का आधार है।
– सम्यग्दर्शन, सम्यक्ज्ञान और सम्यक्चरित्र ही आत्मा को परमात्मा बनाते हैं।
– भ्रम और अंधानुकरण से बचकर भगवान महावीर के सिद्धांतों का अनुसरण ही जीवन की सर्वोच्च साधना है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

