“विवाह के लिए दुल्हन सजती है, लेकिन लड़के को जीवनभर की सजा मिल जाती है” — आचार्य प्रसन्न सागर महाराज का व्यंग्यपूर्ण संदेश, बदलती सामाजिक सोच पर किया प्रहार
विवाह के बदलते मापदंडों पर आचार्यश्री ने जताई चिंता, कहा— संस्कारों से अधिक पैकेज और पसंद को मिल रही प्राथमिकता
पुष्पगिरी, सोनकच्छ।
अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में वर्तमान समय की विवाह व्यवस्था और समाज की बदलती मानसिकता पर गंभीर किंतु व्यंग्यपूर्ण अंदाज में विचार व्यक्त किए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “विवाह के लिए दुल्हन सजा दी जाती है… और लड़के को जीवनभर की सजा मिल जाती है।” उनके इस कथन पर उपस्थित श्रद्धालुओं में मुस्कान भी बिखरी और गहन चिंतन का वातावरण भी बना।
आचार्यश्री ने कहा कि आज माता-पिता अपने पुत्र-पुत्रियों के विवाह के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, लेकिन फिर भी योग्य रिश्ते नहीं मिल पा रहे हैं। यह स्थिति आज घर-परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है।
उन्होंने दशकों के अनुसार विवाह संबंधी सामाजिक सोच में आए बदलाव का उल्लेख करते हुए कहा कि 1980 के दशक में अपने ही कुल, वंश और जाति में विवाह को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती थी। 1990 के दशक में दिगंबर या श्वेतांबर जैन समाज को महत्व मिला। 2000 के दशक में केवल जैन होना ही पर्याप्त माना जाने लगा।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि 2010 के दशक में जाति और वंश की शुद्धता पर अधिक बल दिया गया, जबकि 2020 के दशक में शाकाहारी और हिंदू परिवार को प्राथमिकता मिलने लगी। वहीं 2026 के दौर में समाज की सोच इस दिशा में पहुंच गई है कि लड़का कमाने वाला हो, अच्छा व्यापार या आकर्षक पैकेज हो, व्यक्तित्व प्रभावशाली हो और बेटी को पसंद आ जाए— बाकी समाज, धर्म और खान-पान जैसी बातें पीछे छूटती जा रही हैं।
आचार्यश्री ने संकेत दिया कि जब विवाह का आधार केवल आर्थिक स्थिति, बाहरी आकर्षण और व्यक्तिगत पसंद बन जाएगा, तब संस्कार, पारिवारिक मूल्य और धार्मिक आस्थाएं कमजोर पड़ने लगेंगी। उन्होंने समाज से आग्रह किया कि विवाह जैसे पवित्र संस्कार में केवल भौतिक सुविधाओं के बजाय संस्कार, चरित्र और पारिवारिक मूल्यों को भी समान महत्व दिया जाए।
प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल (औरंगाबाद) से प्राप्त जानकारी।
संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

