ब्रह्ममुहूर्त में जागें, संयम अपनाएं और मोबाइल की गुलामी छोड़ें : आचार्य विहर्ष सागर महाराज

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ब्रह्ममुहूर्त में जागें, संयम अपनाएं और मोबाइल की गुलामी छोड़ें : आचार्य विहर्ष सागर महाराज

अष्टाह्निका महापर्व के दूसरे दिन दिया अनुशासित जीवन का संदेश, कहा— धर्म और विज्ञान दोनों समयबद्ध दिनचर्या की करते हैं वकालत

मदनगंज-किशनगढ़।
जैन भवन में चल रहे पावन अष्टाह्निका महापर्व के दूसरे दिन श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए आचार्य श्री 108 विहर्ष सागर महाराज ने संयम, अनुशासन और आध्यात्मिक जीवन का महत्व बताते हुए कहा कि धर्म और विज्ञान दोनों ही ब्रह्ममुहूर्त में जागने, समय पर सोने और संयमित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवनशैली में देर रात तक मोबाइल का अत्यधिक उपयोग और सुबह देर से उठना शरीर एवं मन दोनों के लिए हानिकारक है।

 

 

प्रवचन के दौरान मुनिश्री 108 विजयेश सागर महाराज ने कहा कि धर्म साधना आत्मा को ऊँचाइयों तक ले जाने का मार्ग है। साधना जितनी गहरी होती है, आत्मा उतनी ही निर्मल और श्रेष्ठ बनती है। उन्होंने कहा कि सिद्ध भगवान समस्त जीवों के लिए प्रेरणास्रोत हैं और जिनवाणी का श्रवण महान पुण्यों का फल है। जो व्यक्ति स्वयं जिनवाणी सुनता है और दूसरों को भी सुनने के लिए प्रेरित करता है, वही वास्तव में भव्य जीव है।

 

 

आचार्य श्री ने कहा कि आज लोग स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद वातानुकूलित अस्पतालों के आईसीयू में आराम तलाशते हैं, जबकि यदि समय रहते संयमित दिनचर्या अपनाई जाए तो अनेक बीमारियों से बचा जा सकता है। सप्ताह में एक दिन विश्राम करें, नियमित व्यायाम करें, समय पर स्नान करें, संतुलित भोजन लें और सोने से पहले मोबाइल से दूरी बनाएं। उन्होंने कहा कि ब्रह्ममुहूर्त में अध्ययन करने से बुद्धि का तीव्र विकास होता है, इसलिए विद्यार्थियों को इस समय का सदुपयोग करना चाहिए।

 

 

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल मोबाइल चलाना ही जीवन नहीं है। परिवार के साथ समय बिताना, धर्म-आराधना करना, सेवा, भक्ति, संतुलित भोजन और पर्याप्त विश्राम ही जीवन को सार्थक बनाते हैं। समाज और परिवार में बढ़ती दूरियों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि बच्चों को धार्मिक और नैतिक संस्कार देना माता-पिता का सबसे बड़ा दायित्व है। अच्छी संगति जीवन बनाती है, जबकि गलत संगति व्यक्ति को पतन की ओर ले जाती है।

 

आचार्य श्री ने कहा कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वाध्याय, आत्मचिंतन और आत्मसुधार का मार्ग अपनाना चाहिए। छोटी-छोटी गलतियों को समय रहते सुधार लिया जाए तो जीवन श्रेष्ठ बन जाता है। उन्होंने भारतीय संस्कृति की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान महावीर, भगवान राम, भगवान कृष्ण और तीर्थंकरों की पावन भूमि होने के कारण भारत की संस्कृति पूरे विश्व में अद्वितीय और प्रेरणादायी है।

— संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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