त्याग, संयम और आत्मचिंतन से ही प्रशस्त होता है मोक्षमार्ग : निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज

धर्म

त्याग, संयम और आत्मचिंतन से ही प्रशस्त होता है मोक्षमार्ग : निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज
सिद्धचक्र महामंडल विधान के दूसरे दिन भक्ति, साधना और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत संगम
पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसियां जी में श्रद्धालुओं ने श्रद्धा-भक्ति के साथ किया विधान, पूजन एवं आराधना
कोटा, 22 जुलाई।
श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित नौ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान महोत्सव का दूसरा दिन श्रद्धा, भक्ति, संयम एवं आध्यात्मिक साधना से ओतप्रोत रहा। प्रातःकाल से ही मंदिर परिसर मंर धर्मावलंबियों का उत्साहपूर्ण आगमन प्रारंभ हो गया और पूरे वातावरण में नवकार महामंत्र, भक्तिभाव तथा जिनवाणी की मंगलध्वनि गूंजती रही।

 

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी के निदेशक हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि प्रातःकाल श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक भगवान श्री आदिनाथ का अभिषेक, शांतिधारा एवं नित्य पूजन संपन्न किया। इसके उपरांत सिद्धचक्र महामंडल विधान के द्वितीय दिवस की विधिवत पूजा, अर्घ्य समर्पण, मंत्रोच्चार एवं धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न हुए, जिनमें बड़ी संख्या में महिला एवं पुरुष श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर आत्मकल्याण एवं विश्व मंगल की भावना से आराधना की।

आत्मा की ओर लौटना ही धर्म का वास्तविक उद्देश्य
विधान समिति के अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि अनादिकाल से असंख्य आत्माएँ संसार में इसलिए भटक रही हैं क्योंकि उनका लक्ष्य आत्मा की प्राप्ति के स्थान पर बाह्य पदार्थों की प्राप्ति बन गया है।

उन्होंने कहा कि भगवान की आराधना, गुरु सेवा, स्वाध्याय, तप, संयम और तीर्थयात्रा किसी सांसारिक उपलब्धि के लिए नहीं, बल्कि आत्मा को उसके शुद्ध एवं वास्तविक स्वरूप तक पहुँचाने के साधन हैं। धर्म का प्रत्येक कार्य आत्मकल्याण की दिशा में उठाया गया एक पवित्र कदम है।

त्याग और साधना से प्रशस्त होता है मोक्ष का मार्ग
मुनिश्री ने सरल उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे कोई व्यक्ति अपनी ही जेब से धन निकालता है तो उसे चोरी नहीं कहा जाता, उसी प्रकार आत्मकल्याण के लिए की जाने वाली आराधना भी कर्मबंधन का कारण नहीं बनती। बंध तब उत्पन्न होता है जब मनुष्य भौतिक सुखों, परिग्रह, विषय-वासनाओं और सांसारिक आसक्तियों की कामना करता है।
उन्होंने कहा कि मोक्ष का वास्तविक अर्थ केवल शरीर का अंत नहीं, बल्कि राग, द्वेष, मोह, अहंकार और परिग्रह जैसे आंतरिक विकारों का पूर्ण त्याग है। यदि जीवन में त्याग, संयम, स्वाध्याय और आत्मचिंतन का भाव विकसित हो जाए, तो मोक्षमार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है।
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा कि जिस निष्ठा, परिश्रम और समर्पण से मनुष्य अपने व्यापार, व्यवसाय और पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करता है, उसी समर्पण के साथ यदि धर्म-साधना करेगा तो जीवन का परम लक्ष्य अवश्य प्राप्त होगा।
पुण्य ही सभी उपलब्धियों का आधार

धर्मसभा को संबोधित करते हुए क्षुल्लक संयम सागर जी महाराज ने पुण्य और पाप के सिद्धांत को अत्यंत सरल एवं प्रेरक उदाहरणों के माध्यम से समझाया।

उन्होंने कहा कि संसार में व्यक्ति को मिलने वाला सम्मान, पद, प्रतिष्ठा और अवसर केवल पुरुषार्थ का परिणाम नहीं, बल्कि पूर्व संचित पुण्यों के उदय का भी प्रतिफल होता है। एक ही संस्था या व्यापार में कार्य करने वाले कर्मचारी और प्रबंधक के प्रतिफल में दिखाई देने वाला अंतर केवल योग्यता से नहीं, बल्कि पुण्य के प्रभाव से भी निर्धारित होता है।
उन्होंने कहा कि बिना पुण्य के जीवन में कोई भी महान उपलब्धि संभव नहीं है। संतों का दुर्लभ सान्निध्य, धर्मश्रवण और आराधना का अवसर भी पूर्व जन्मों के पुण्यों का ही परिणाम है।

क्षुल्लक श्री ने कहा कि यदि आज कोटा की पुण्यभूमि को निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज का चातुर्मास एवं पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ है, तो यह समूचे जैन समाज के सामूहिक पुण्योदय का प्रतिफल है। ऐसे दुर्लभ अवसर बार-बार प्राप्त नहीं होते, इसलिए प्रत्येक श्रद्धालु को धर्म, दान, तप, संयम और साधना के माध्यम से अपने पुण्य का निरंतर संवर्धन करना चाहिए।

प्रतिदिन हो रहे हैं विविध धार्मिक अनुष्ठान
मुख्य संयोजक धर्मचंद जैन धानोप्या एवं अर्चना (रानी) सर्राफ ने बताया कि सिद्धचक्र महामंडल विधान के अंतर्गत द्वितीय दिवस दूसरी पूजा के 16 तथा तृतीय पूजा के 32 अर्घ्य श्रद्धाभाव से समर्पित किए गए। प्रतिदिन अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, विधान, प्रवचन एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भक्तिमय वातावरण में सम्पन्न हो रहा है।

भक्ति से सराबोर रहा मंदिर परिसर
समिति के महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि सिद्धचक्र महामंडल विधान के दूसरे दिन श्रद्धालुओं ने अत्यंत उत्साह एवं श्रद्धा के साथ सभी धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। भक्ति गीतों, मंगलाचरण, नवकार महामंत्र के सामूहिक जाप तथा संतों के प्रेरणादायी प्रवचनों से पूरा मंदिर परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा एवं भक्तिरस से सराबोर रहा।
उन्होंने बताया कि नौ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान के आगामी दिनों में भी विविध धार्मिक अनुष्ठान, अभिषेक, पूजन, प्रवचन, विधान तथा सांस्कृतिक-धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
आज के पुण्यार्जक
समिति के उपाध्यक्ष सुमित जैन ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री पदमचंद जी (दीमापुर, नागालैंड), श्री राजकुमार जी एवं धर्मपत्नी (गुवाहाटी), श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार, श्री पदमचंद जी (नागालैंड) तथा श्री महावीर जी मित्तल परिवार द्वारा किया गया।
उन्होंने बताया कि आज के श्रावक श्रेष्ठी एवं शास्त्र भेंट के पुण्यार्जन का सौभाग्य भी श्रद्धालुओं द्वारा भक्तिभावपूर्वक प्राप्त किया गया।
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गुरुवाणी के प्रमुख संदेश
🔸 आत्मा की प्राप्ति ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य है।
🔸 त्याग, संयम और आत्मचिंतन से मोक्षमार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है।
🔸 आराधना आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप तक पहुँचाने का माध्यम है।
🔸 राग, द्वेष, मोह और परिग्रह का त्याग ही वास्तविक मोक्ष है।
🔸 पुण्य ही सम्मान, अवसर और संतों के सान्निध्य का मूल आधार है।
🔸 धर्म, दान, तप और संयम से जीवन में पुण्य का निरंतर संवर्धन करें।
🔸 धर्म में लगाया गया प्रत्येक क्षण आत्मकल्याण की अमूल्य निधि है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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